
अस्पताल में बेटी को देखकर छलक पड़े आंसू, रक्सौल पुलिस ने महिला की इच्छा को दी प्राथमिकता; अनुमंडल अस्पताल से आनंद बुजुर्ग आश्रम पहुंचीं पूर्व प्राचार्य, स्वच्छ रक्सौल ने उठाई इलाज और कानूनी मदद की जिम्मेदारी
रक्सौल। (Vor Desk)। जिस मां ने बेटियों को जन्म दिया, उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया और अपने पैरों पर खड़ा होने का सपना देखा, आज उसी मां ने उनके साथ रहने से इनकार कर दिया! रक्सौल की पूर्व शिक्षिका एवं फुलचंद्र साह मध्य विद्यालय की पूर्व प्राचार्य आभा देवी की कहानी अब सिर्फ बदहाली और रेस्क्यू तक सीमित नहीं रह गई है। अनुमंडल अस्पताल में इलाज के दौरान जब उनकी तीन बेटियों में सबसे छोटी बेटी श्रुति गुरुवार की देर रात्रि उनसे मिलने पहुंचीं, तो मां की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। गहरी पीड़ा और भावनात्मक टूटन के बीच उन्होंने बेटियों के साथ जाने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि वह कहीं भी चली जाएंगी, कहीं भी रह लेंगी, लेकिन बेटियों के साथ नहीं जाएंगी।
यह फैसला कितना पीड़ादायक रहा होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अस्पताल में मौजूद लोग भी भावुक हो उठे। आखिर एक मां को ऐसी कौन सी पीड़ा और परिस्थिति से गुजरना पड़ा कि उसने अपनी ही संतानों के साथ रहने के बजाय अनजान लोगों के बीच आश्रय लेना बेहतर समझा? इस सवाल का जवाब अभी सामने आना बाकी है।
थाने में पहुंचीं बेटी, पुलिस ने मां की मर्जी को दी प्राथमिकता
आभा देवी की बेटी श्रुति रक्सौल थाना पहुंचीं। इस दौरान थानाध्यक्ष सह पुलिस निरीक्षक रमेश महतो ने मामले में संवेदनशीलता दिखाते हुए सबसे पहले पीड़िता की इच्छा जाननी चाही। उन्होंने स्पष्ट किया कि आभा देवी जहां रहना चाहेंगी, उनकी इच्छा के अनुसार ही व्यवस्था की जाएगी।इस मौके पर वार्ड21के वार्ड पार्षद सीमा देवी की प्रतिनिधि सह पति दीपक कुमार गुप्ता एवं अन्य कई समाजसेवी मौजूद थे।
इसके बाद आभा देवी की सहमति से उन्हें शहर स्थित आनंद बुजुर्ग आश्रम भेजने का निर्णय लिया गया,जिसका संचालन स्वच्छ रक्सौल करती है। अनुमंडल अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्हें आश्रम पहुंचाया गया।
बेटी श्रुति इस घटनाक्रम से स्तब्ध थीं। मां का यह फैसला उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन था।वह गिड़गिडाती हुई अपनी बेबसी बता रही थी कि उनके सासू की भी तबियत खराब है,मां की भी, मैं क्या करूं?उन्होंने इनकार किया कि मैने कोई रजिस्ट्री नहीं कराई है..!इधर सूचना और चर्चा है कि अन्य दो बेटियों ने अभी तक कॉल कर मां का हाल चाल भी नहीं लिया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पीड़िता आभा देवी का कथन—’जिसने सहारा दिया, वही हमारा है’—मानवीय रिश्तों और जिम्मेदारियों पर गहरा सवाल छोड़ गया।
अजनबियों ने थामा हाथ, आश्रम में मिला नया सहारा
आश्रम पहुंचते ही वहां पहले से रह रहीं महिलाओं और युवतियों ने आभा देवी का हाथ थामा। किसी ने उनका आंसू पोंछा तो किसी ने उन्हें ढांढस बंधाया। जिन परिस्थितियों में वह अपने घर से अस्पताल पहुंची थीं, उसके बाद आश्रम में मिला यह अपनापन उनके लिए बड़ी राहत बनकर आया।
स्वच्छ रक्सौल संस्था के अध्यक्ष रंजीत सिंह ने कहा कि आभा देवी को मानवीय तौर पर आश्रम में सहारा मिल गया है। जब तक उनकी जिंदगी रहेगी, संस्था उनकी सेवा और सहायता से पीछे नहीं हटेगी। संस्था अब उनके बेहतर इलाज, स्वास्थ्य में सुधार और आवश्यक कानूनी सहायता की व्यवस्था में जुट गई है।
क्या संपत्ति के विवाद ने रिश्तों को इतना बेरहम बना दिया?
गौरतलब है कि गुरुवार की रात रक्सौल के वार्ड-21 स्थित सब्जी बाजार में आभा देवी एक बंद कमरे में बेहद बदहाल हालत में मिली थीं। गंदगी और दुर्गंध के बीच वह कुर्सी पर निढाल पड़ी थीं। खुद से खड़ा होना भी उनके लिए संभव नहीं था। गुप्त सूचना पर डायल-112 के प्रभारी रामानंद सिंह के नेतृत्व में पहुंची पुलिस टीम और स्वच्छ रक्सौल संस्था के सदस्यों ने संयुक्त रूप से उन्हें रेस्क्यू कर अनुमंडल अस्पताल में भर्ती कराया था।
आभा देवी की उम्र 66 वर्ष बताई गई है। वह सेवानिवृत्त शिक्षिका और फुलचंद्र साह मध्य विद्यालय की पूर्व प्राचार्य हैं। उनके पति ओम प्रकाश पांडे वार्ड-21 के पूर्व पार्षद एवं नगर परिषद की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य रह चुके थे। कुछ वर्ष पूर्व हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया था। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। जिस मकान में आभा देवी रहती थीं, उसके एक हिस्से में उनके भाई का परिवार भी रहता है।
स्थानीय स्तर पर संपत्ति को लेकर रिश्तेदारों के बीच विवाद की आशंका जताई जा रही है।यह जमीन और मकान करीब4 धूर में है,जो कीमती है। उसमें दो दुकान भी है। यह चर्चा भी है कि कुछ दिन पहले उन्हें घर से बाहर ले जाया गया था और रजिस्ट्री कराने की आशंका के बीच बाद में घर में बंद कर दिया गया। हालांकि, इन चर्चाओं और आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है कि आखिर घर के बाहर उन्हें कब,किसने,क्यों ले गया था और फिर वापस क्यों बंद कर छोड़ दिया..!
चर्चा के मुताबिक, घर के मुख्य दरवाजे की चाबी एक स्थानीय सब्जी विक्रेता के पास थी। गुप्त सूचना पर पहुंची टीम के हस्तक्षेप और हो-हल्ले के बाद दरवाजा खुल सका। घर के भीतर कई दिनों से पड़ा सूखा भोजन और फैली गंदगी उनकी बदहाली की कहानी बयां कर रही थी। यह भी दावा किया जा रहा है कि वह कई दिनों से समुचित भोजन नहीं कर पा रही थीं।अकेला,असहाय कमरे में बंद थी।
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि रिश्तेदारों के कथित व्यवहार और विवाद के डर से आसपास के लोग हस्तक्षेप करने से कतराते थे। यह भी बताया जा रहा है कि आभा देवी पहले से लकवे से पीड़ित थीं और पति के निधन के बाद समुचित इलाज नहीं मिलने से उनकी स्थिति और बिगड़ती गई। इन सभी पहलुओं की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
अब सवाल सिर्फ एक मां के आश्रय का नहीं, जवाबदेही का भी है
आभा देवी को फिलहाल आश्रय मिल गया है, लेकिन उनकी लंबी चिकित्सा और कानूनी लड़ाई अभी बाकी है। सवाल यह है कि एक शिक्षिका, जिसने पूरी जिंदगी समाज और बच्चों को शिक्षा देने में बिताई, वह अपने जीवन के इस पड़ाव पर इतनी असहाय कैसे हो गईं? उनकी बीमारी के दौरान देखभाल की जिम्मेदारी किसकी थी? घर के भीतर उनकी ऐसी स्थिति कब से थी? क्या किसी ने उनकी सुध लेने की कोशिश नहीं की?
रिश्तों की असली परीक्षा विरासत और संपत्ति के बंटवारे में नहीं, बल्कि बीमारी और बेबसी के समय होती है। आभा देवी की कहानी समाज के सामने एक कड़वी हकीकत रखती है।
एक तरफ बेटियों के साथ जाने से इनकार करती मां के आंसू हैं, दूसरी तरफ अनजान महिलाओं का थामता हुआ हाथ। सवाल यह नहीं कि आभा देवी को आश्रम क्यों जाना पड़ा, सवाल यह है कि आखिर उन्हें अपने घर में ऐसा कौन सा दर्द मिला कि आश्रम का अनजानपन भी उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगा?
फिलहाल, आभा देवी को सहारा मिल गया है। अब उम्मीद है कि उनका स्वास्थ्य सुधरेगा और जांच के जरिए उन तमाम सवालों के जवाब भी सामने आएंगे, जो इस घटना ने पूरे रक्सौल के सामने खड़े कर दिए हैं।
