
त्वरित टिप्पणी
रक्सौल।(Vor desk)।
एक पूर्व शिक्षिका… एक पूर्व प्राचार्य… दिवंगत नगर पार्षद की पत्नी… और कभी समाज के बीच सम्मान से जीने वाली महिला!
आज वही आभा देवी बदहाल हालत में कमरे में बंद मिलीं। डायल-112 और स्वच्छ रक्सौल की टीम ने उन्हें रेस्क्यू कर अनुमंडल अस्पताल पहुंचाया। इलाज शुरू हुआ, तब जाकर उनकी सुध लेने वाले सामने आए।
लेकिन सवाल सिर्फ आभा देवी की बदहाली का नहीं है। सवाल उस पूरे सामाजिक तंत्र का है, जो आदर्शों की माला जपता है, मगर अपने आसपास बिखरती इंसानियत को देखने की फुर्सत नहीं निकालता!
रक्सौल की बेहतरी का दावा करने वाले माननीय नगर पार्षदों और पूर्व पार्षदों से एक सवाल तो बनता है—शहर को आदर्श बनाने की घोषणाओं के बीच क्या कभी अपने पड़ोस, अपने समाज और अपने पुराने साथियों के परिवारों का हाल जानने की भी जिम्मेदारी बनती है?
दिवंगत पार्षद ओम प्रकाश पांडे के साथ उठने-बैठने वाले, उनके समकालीन और मित्र रहे लोगों से भी समाज जवाब चाहता है। अगर साथ बैठकर यात्राएं हुईं, नेपाल के टूर की यादें साझा हुईं, दोस्ती के किस्से बने, तो क्या उस दोस्त के गुजर जाने के बाद उसके परिवार की सुध लेना भी दोस्ती का हिस्सा नहीं था?
दोस्ती की असली परीक्षा साथ घूमने में नहीं, दोस्त के बाद उसके अपनों का हाल पूछने में होती है!
और शिक्षक समाज? जिस समाज को संवेदना, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का वाहक माना जाता है, उसके बीच की एक सेवानिवृत्त शिक्षिका ऐसी हालत में पहुंच जाएं, तो यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, हमारे सामाजिक विवेक के सामने खड़ा सवाल भी है।
शासन-प्रशासन से भी सवाल है—क्या किसी असहाय व्यक्ति की सुध लेने के लिए उसकी जिंदगी को इस हद तक पहुंचना जरूरी है कि पुलिस को दरवाजा खुलवाकर उसे अस्पताल पहुंचाना पड़े? क्या सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय निगरानी का तंत्र केवल कागजों और बैठकों तक सीमित रहेगा?
और परिजनों से जुड़े सवाल भी कम गंभीर नहीं हैं। अगर महिला की देखभाल नहीं हो रही थी, तो क्यों? उनकी बीमारी, भोजन और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? संपत्ति को लेकर विवाद की जो आशंकाएं सामने आ रही हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप साबित होना बाकी है, लेकिन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
विडंबना देखिए—शहर में आदर्शवाद के भाषण देने वालों की कमी नहीं, लेकिन एक असहाय महिला की खामोशी सुनने वाला कौन था?
हम सड़क, नाला, बिजली, बाजार और विकास की बातें करते हैं। ये सब जरूरी हैं। मगर जिस शहर में एक बीमार महिला की सुध लेने वाला कोई न दिखे, वहां विकास के दावों के साथ संवेदना का हिसाब भी मांगना चाहिए।
आज आभा देवी का रेस्क्यू हुआ है। कल किसी और की बारी हो सकती है। इसलिए यह मामला किसी एक घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
याद रखिए—इंसानियत की परीक्षा मंच पर माला पहनने से नहीं, किसी असहाय के आंसू पोंछने से होती है।
रक्सौल को आदर्श बनाने का दावा करने वालों से बस इतना सवाल है—
शहर को बदलने निकले हैं, कभी अपने समाज की बदहाली भी देखिए!
क्योंकि जिस समाज में इंसान अकेला पड़ जाए और संवेदनाएं तमाशबीन बन जाएं, वहां सबसे पहले इंसानियत का पुनर्वास जरूरी है।
