Sunday, October 11

रक्सौल में मानवता की अनूठी मिसाल: ‘आनन्द आश्रम’ का शुभारंभ, बेसहारा बुजुर्गों को मिला नया आशियाना

रक्सौल (VOR डेस्क) | 11 अक्टूबर 2026

रक्सौल शहर में समाज सेवा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित होने वाली पहल की शुरुआत हुई है। रविवार को सीमावर्ती शहर में बेसहारा, उपेक्षित और असहाय बुजुर्गों के लिए समर्पित ‘बुजुर्ग आनन्द आश्रम’ का भव्य शुभारंभ किया गया। यह आश्रम उन वृद्धजनों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आया है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव में अपनों की उपेक्षा, परिवार से बिछड़ने या आर्थिक तंगी के कारण दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।

भव्य उद्घाटन और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति

आश्रम का विधिवत उद्घाटन फीता काटकर किया गया। उद्घाटन समारोह में नगर पार्षद जितेंद्र दत्ता, बिमल सर्राफ, डॉ. सुशील कुमार सिंह, बबन प्रसाद, एवं उर्मिला देवी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर और फीता काटकर इस मानवीय सेवा की शुरुआत की।

इस अवसर पर शहर के कई प्रतिष्ठित लोग और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से अजय बाबल, मोहम्मद जैद, अम्बुज गुप्ता, ई. अनिल कुमार, नरेश पटेल, साबरा खातुन, श्वेता श्रीवास्तव, परमानन्द तिवारी और नेहा श्रीवास्तव शामिल रहे। अतिथियों ने इस पहल को समाज के लिए बेहद जरूरी और सराहनीय कदम बताया।

बुजुर्गों को मिलेगी रोटी, कपड़ा, आवास और दवा की मुमुक्षु व्यवस्था

‘स्वच्छ रक्सौल’ के अध्यक्ष सह आनन्द आश्रम के संचालक रणजीत सिंह ने इस अवसर पर कहा कि इस आश्रम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य उन बुजुर्गों को शरण देना है, जिनका कोई सहारा नहीं है। उन्होंने कहा कि ढलती उम्र में जिन बुजुर्गों के पास रहने के लिए छत नहीं है और जो भोजन व दवाओं के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, उन्हें यहाँ पूरी गरिमा के साथ रखा जाएगा।

आश्रम के माध्यम से बुजुर्गों को निम्नलिखित मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी:

  • आवास: सुरक्षित और सम्मानजनक रहने का ठिकाना।
  • भोजन: समय पर पौष्टिक और नियमित भोजन।
  • वस्त्र: मौसम के अनुकूल कपड़े और बिस्तर।
  • चिकित्सा: आवश्यक दवाइयां और स्वास्थ्य संबंधी नियमित देखभाल।
  • पुनर्मिलन: बिछड़े हुए बुजुर्गों को उनके परिवारों से वापस मिलाने के लिए विशेष प्रयास।

“बुजुर्ग बोझ नहीं, हमारे समाज की धरोहर हैं”

वक्ताओं ने अपने संबोधन में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज भी समाज में कई ऐसे बुजुर्ग हैं, जो कभी अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए दिन-रात मेहनत करते थे, लेकिन उम्र ढलने के बाद उन्हें स्टेशन, मंदिरों के आसपास, सड़कों और फुटपाथों पर जीवन गुजारना पड़ता है। उनके पास न कोई नियमित आय होती है और न ही इलाज की व्यवस्था।

संचालक रणजीत सिंह ने कहा, “बुजुर्ग हमारे समाज के लिए कोई बोझ नहीं, बल्कि हमारी अमूल्य धरोहर और अनुभव के मार्गदर्शक हैं। जिस उम्र में उन्हें परिवार के स्नेह और सम्मान की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उस समय उन्हें अकेला छोड़ देना एक गंभीर सामाजिक चिंता है।”

समाज के सहयोग से परवान चढ़ेगा सेवा का संकल्प

आनन्द आश्रम की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और भविष्य में इसे निरंतर बनाए रखने के लिए शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, व्यवसायियों, सामाजिक संगठनों और दानदाताओं से बढ़-चढ़कर सहयोग करने की अपील की गई है। आयोजकों का मानना है कि जनसहयोग के बिना इस तरह के मानवीय अभियानों को चलाना मुश्किल होता है, इसलिए समाज के हर वर्ग को आगे आना चाहिए।

कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि किसी भी समाज की असली पहचान उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ कैसा बर्ताव करता है।

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