
तीन दिनों की मूसलाधार बारिश ने खोली विकास के दावों की पोल, सड़कें बनीं तालाब, नालियां फेल, जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त
रक्सौल। (VoR डेस्क)
सिर्फ तीन दिनों की लगातार बारिश ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रक्सौल हर मानसून में इसी तरह डूबता रहेगा? करोड़ों रुपये की योजनाएं, नालों की सफाई के दावे और विकास के बड़े-बड़े वादे आखिर गए कहां? हल्की से मध्यम बारिश ने पूरे शहर की जलनिकासी व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी है।
अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती शहर रक्सौल इस समय ‘पानी-पानी’ है। मुख्य सड़कों से लेकर मोहल्लों तक पानी और कीचड़ का साम्राज्य है। कई इलाकों में सड़कें तालाब में तब्दील हो चुकी हैं। लोग घरों से निकलने में डर रहे हैं, दोपहिया वाहन फिसल रहे हैं और पैदल चलना भी किसी जोखिम से कम नहीं है।
भारत-नेपाल को जोड़ने वाली मुख्य सड़क, मछली बाजार रोड, पोस्ट ऑफिस रोड, बैंक रोड, सब्जी बाजार, ओल्ड आईओसी गली, ओल्ड एक्सचेंज रोड, आश्रम रोड, काली नगरी, मौजे, रेलवे कॉलोनी, तुमड़िया टोला, मालगोदाम रोड, अंबेडकर बस्ती, सुंदरपुर, ब्लॉक रोड और अनुमंडल कार्यालय परिसर सहित शहर का बड़ा हिस्सा जलभराव से जूझ रहा है। जगह-जगह कीचड़ और गंदा पानी जमा होने से लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल नगर परिषद की तैयारियों पर उठ रहा है। हर वर्ष मानसून से पहले नालों की सफाई और जलनिकासी व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली तेज बारिश में ही पूरी व्यवस्था धराशायी नजर आ रही है। कई स्थानों पर नालियां जाम हैं, पानी की निकासी पूरी तरह ठप है और बारिश का पानी घंटों तक सड़कों पर जमा रह रहा है।
शहर के कई इलाकों में हालात और बदतर हैं। लोगों का आरोप है कि नालों की उड़ाही के बाद निकाली गई गाद और कचरे का समय पर निस्तारण नहीं किया गया। बारिश के साथ वही गाद दोबारा नालियों में बह गई, जिससे नालियां फिर जाम हो गईं। नतीजतन सड़कें कीचड़ में बदल गईं और दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
स्थिति को और गंभीर बनाने में अधूरी सड़कें, जर्जर नाले, अनियोजित निर्माण और विभिन्न योजनाओं के तहत की गई बेतरतीब खुदाई भी बड़ी वजह बन रही है। कई स्थानों पर जलनिकासी के प्राकृतिक मार्ग बाधित हो चुके हैं, जिससे बारिश का पानी निकलने के बजाय सड़कों और बस्तियों में जमा हो रहा है।
इस बदहाली का सीधा असर आम लोगों और कारोबार पर पड़ा है। बाजारों में ग्राहकों की संख्या घट गई है, दुकानदारों का व्यवसाय प्रभावित हो रहा है, वाहन चालक घंटों जाम और जलभराव से जूझ रहे हैं, जबकि स्कूली बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए आवागमन बड़ी चुनौती बन गया है।
बार-बार बनने वाली यह स्थिति अब केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि शहरी कुप्रबंधन का गंभीर उदाहरण बनती जा रही है। शहरवासियों का सवाल है कि जब हर साल यही हाल होना है, तो आखिर विकास और जलनिकासी पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का लाभ जनता को कब मिलेगा?कांग्रेस नेता डा गौतम कुमार का सवाल है कि शहर में जो विकास कार्य हुए,उसका प्रयोजन रक्सौल वासियों के विनाश के लिए है?बसपा नेता चंद्र किशोर पाल ने सवाल किया कि कमीशन के चक्कर में रक्सौल की दुर्दशा कराने वालों पर कब करवाई होगी?,
फिलवक्त ,रक्सौल के लोगों ने नगर परिषद और जिला प्रशासन से तत्काल युद्धस्तर पर जलनिकासी की व्यवस्था बहाल करने, जाम नालों की सफाई कराने, क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत करने और मानसून से पहले स्थायी एवं वैज्ञानिक जलनिकासी प्रणाली विकसित करने की मांग की है, ताकि हर बारिश में शहर को ‘पानी-पानी’ होने से बचाया जा सके।
