Wednesday, May 27

एशिया के व्यस्त सीमाई कॉरिडोर में दो ओवरब्रिज निर्माण से जाम मुक्ति की उम्मीद, 157 करोड़ की परियोजना से नेपाल कनेक्टिविटी और व्यापार को मिलेगा नया आयाम

भारत-नेपाल सीमा पर 36 साल पुराना सपना फिर जगा: रक्सौल में दो आरओबी परियोजनाओं से बदल सकती है पूरे क्षेत्र की तस्वीर

रक्सौल (बिहार)। (Vor desk)।भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय महत्व के शहर रक्सौल में तीन दशक से अधिक समय से लंबित रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) परियोजना एक बार फिर उम्मीद जगाने लगी है। रेलवे क्रॉसिंग संख्या 33 और 34 पर मिट्टी परीक्षण शुरू होने के साथ ही सीमावर्ती इलाके में बुनियादी ढांचे के बड़े बदलाव की संभावनाएं तेज हो गई हैं।

करीब 36 वर्षों से फाइलों और घोषणाओं में अटकी यह परियोजना अब धरातल पर उतरती दिख रही है। यदि निर्माण कार्य समयबद्ध तरीके से पूरा होता है, तो यह केवल रक्सौल की यातायात व्यवस्था ही नहीं बदलेगा, बल्कि भारत-नेपाल व्यापार, सीमा पार आवागमन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी नई गति देगा।

सीमाई शहर की सबसे बड़ी समस्या: घंटों जाम और ठप यातायात

रक्सौल, भारत और नेपाल के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। यही मार्ग नेपाल के वीरगंज ड्राई पोर्ट, इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP), रेलवे नेटवर्क और राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ता है। बावजूद इसके, रेलवे फाटक संख्या 33 और 34 वर्षों से इस शहर की सबसे बड़ी यातायात बाधा बने हुए हैं।

स्थानीय प्रशासनिक आंकड़ों और नागरिकों के अनुसार, दिनभर में 17 से 18 घंटे तक फाटक बंद रहने की स्थिति में शहर दो हिस्सों में बंट जाता है। एंबुलेंस, स्कूली वाहन, मालवाहक ट्रक और आम यात्रियों को घंटों जाम में फंसना पड़ता है। इसका असर न केवल शहरी जीवन पर बल्कि सीमा पार व्यापारिक गतिविधियों पर भी पड़ता है।

1990 के दशक में हुई थी शुरुआत, फिर ठहर गई थी योजना

सूत्रों के मुताबिक, वर्ष 1990 से 1995 के बीच इन दोनों रेलवे क्रॉसिंग पर आरओबी निर्माण की योजना तैयार की गई थी। तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने परियोजना का शिलान्यास भी किया था। शुरुआती स्तर पर सर्वे, पैमाइश और मिट्टी परीक्षण जैसे कार्य किए गए, लेकिन बाद में परियोजना राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से आगे नहीं बढ़ सकी।

अब वर्षों बाद एक बार फिर तकनीकी टीमें सक्रिय हुई हैं और फाटक संख्या 33 पर मिट्टी परीक्षण का कार्य तेज़ी से जारी है। रेलवे फाटक संख्या 34 पर भी जल्द प्रक्रिया शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।

तकनीकी सर्वे ने बढ़ाई उम्मीदें

मिट्टी परीक्षण में जुटे तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, परीक्षण के दौरान गहराई में मिट्टी और बालू का मिश्रित स्तर पाया गया है, जो भारी संरचनात्मक निर्माण के लिए उपयुक्त माना जाता है। प्रारंभिक योजना के तहत रेलवे फाटक संख्या 33 पर लगभग 20 से 22 पिलर बनाए जाने की संभावना है।

वर्तमान में दो तकनीकी टीमों में करीब 12 विशेषज्ञ कार्यरत हैं, जो परियोजना की भू-तकनीकी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।

157 करोड़ की परियोजना से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

जानकारी के अनुसार, दोनों आरओबी परियोजनाओं की अनुमानित लागत लगभग 157 करोड़ रुपये आंकी गई है। परियोजना पूरी होने के बाद आईसीपी, एयरपोर्ट रोड, डंकन अस्पताल, रेलवे स्टेशन और नेपाल के प्रमुख शहर वीरगंज तक आवागमन अधिक तेज़ और सुगम हो जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल यातायात सुधार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत-नेपाल सीमा पर व्यापारिक गतिविधियों, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और निवेश को भी नई दिशा दे सकती है।

नेपाल के लाखों लोगों को भी होगा सीधा लाभ

रक्सौल की भौगोलिक स्थिति इसे केवल बिहार का सीमाई शहर नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण ट्रांजिट कॉरिडोर में शामिल करती है। नेपाल के पर्सा और बारा जिलों के लाखों लोग प्रतिदिन इसी मार्ग का उपयोग करते हैं। ऐसे में आरओबी निर्माण का लाभ दोनों देशों के नागरिकों और व्यापारिक समुदाय को मिलेगा।

स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि लंबे इंतजार के बाद यदि यह परियोजना पूरी होती है, तो रक्सौल की पहचान जाम और अव्यवस्था वाले शहर से बदलकर आधुनिक सीमा व्यापार केंद्र के रूप में स्थापित हो सकती है।

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