
लेखक: भाग्यनाथ प्रसाद गुप्ता
वीरगंज (नेपाल)।नेपाल की वर्तमान राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ राष्ट्रवाद के नाम पर मधेशी जनमानस को प्रताड़ित करने का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। रास्वपा और बालेन सरकार का ताजा फरमान, जिसमें भारत से 100 रुपये से अधिक मूल्य की उपभोग्य वस्तुओं को लाने पर भारी सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) लगाने का प्रावधान है, महज एक आर्थिक निर्णय नहीं है। यह मधेश की जनता को आर्थिक रूप से पंगु बनाने और उनमें विद्रोह की भावना भड़काने की एक गहरी साजिश प्रतीत होती है।
ऐसा लगता है कि नेपाल को ‘भू-राजनीतिक अखाड़ा’ बनाने की रणनीति पर काम चल रहा है। संसद से एमसीसी (MCC) पारित कराना इसी श्रृंखला की पहली कड़ी थी, जिसने राष्ट्र को परोक्ष रूप से बंधक बना दिया है। अब दूसरी और तीसरी रणनीति के तहत, नेपाल की भूमि का उपयोग अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के हितों साधने के लिए किए जाने की आशंका है। एक तरफ उत्तरी सीमा पर चीन के साथ व्यापारिक सुगमता के लिए पास की व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण में मधेशी जनजीवन की जीवनरेखा (रोटी-बेटी का संबंध) पर प्रहार किया जा रहा है।
मधेश हमेशा से नेपाल की अखंडता और देशभक्ति का मिसाल रहा है। इसके बावजूद, पर्वतीय शासक वर्ग ने कभी भी मधेशियों को अंतर्मन से स्वीकार नहीं किया। विडंबना यह है कि उपेंद्र यादव, महंत ठाकुर, राजेंद्र महतो और राजकिशोर यादव जैसे नेताओं ने मधेशी शहादतों का सौदा कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं। इन ‘कठपुतली’ नेताओं ने मधेश को आठ जिलों के एक सीमित प्रदेश में कैद कर दिया, जिसका खामियाजा आज पूरी मधेशी जनता भुगत रही है।
आज सत्ता के शीर्ष पर बैठे चेहरे मधेशी पहचान और संस्कृति के प्रति उदासीनता दिखाते रहे हैं। काठमांडू के मेयर रहते हुए रानी पोखरी में छठ पूजा जैसी आस्था पर रोक लगाने की कोशिश इसका प्रत्यक्ष प्रमाण थी। अब सीमा शुल्क के नाम पर मधेशियों को निशाना बनाना बालेन सरकार के लिए ‘लोहे के चने चबाने’ जैसा साबित होगा।
नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों को खाद्यान्न, नमक और पेट्रोलियम के लिए आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, नीतियां ऐसी बनाई जा रही हैं जो राष्ट्र को एक ‘दरिद्र लैंडलॉक्ड’ देश की ओर धकेल रही हैं। जबकि यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों और सुरक्षा तंत्र पर बाहरी शक्तियों के प्रभुत्व की आहट सुनाई दे रही है।
लेकिन सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि मधेशी जनता अपने आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए कृतसंकल्प है। जिन नेताओं ने संसद और प्रदेश में मधेश के हितों की बलि दी, वे आज जन-संवाद से बाहर हो चुके हैं। शहादत की आहुति कभी निष्फल नहीं जाती। प्राचीन बृहत्तर मधेश के अभ्युदय का नया सवेरा निश्चित रूप से आएगा।
यह समय स्वाभिमानी मधेशियों के लिए एकजुट होने और अपनी भाषा, संस्कृति तथा अधिकारों की रक्षा के लिए समानता की जंग जारी रखने का है। सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।(यह लेख लेखक के अपने निजी विचार हैं)
