✍️ आस्था का अटूट बंधन और प्रदूषित सरिसवा का सवाल….आखिर कब जगेंगे रक्सौलवासी?
रक्सौल।(Vor desk)।लोक आस्था का महापर्व छठ एक बार फिर यह साबित कर गया कि जनमानस की श्रद्धा और निष्ठा के आगे हर व्यवधान छोटा पड़ जाता है। सरिसवा के तट पर बसे सीमावर्ती नगर रक्सौल में, जहाँ भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य देने के लिए बीस छोटे-बड़े घाटों—आश्रम रोड घाट से लेकर सूर्य मंदिर घाट तक—को दुल्हन की तरह सजाया गया, वहाँ एक ओर जहाँ सामुदायिक सद्भाव और आस्था का जनसैलाब उमड़ा, वहीं दूसरी ओर एक गंभीर चुनौती ने प्रशासन और नागरिकों दोनों की चिंता बढ़ा दी।वह चुनौती है, सरिसवा नदी के जल का प्रदूषण।यह पर्व प्रकृति और जल की पवित्रता को समर्पित है, किंतु जब व्रतियों को अपने आराध्य को अर्घ्य देने के लिए घरों की छतों या वैकल्पिक मंदिरों का सहारा लेना पड़े, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हमने अपनी सदानीरा नदियों की अनदेखी की है। यह हृदय विदारक है कि एक ओर आस्था का इतना बड़ा पर्व है, और दूसरी ओर हमारी जीवन...









