Saturday, November 7

क्या सरकारी अस्पताल में गरीब मरीज की जान की कीमत कम है? रक्सौल अनुमंडलीय अस्पताल में डॉक्टर की लापरवाही ने खड़े किए गंभीर सवाल

रक्सौल अनुमंडलीय अस्पताल में वरिष्ठ पत्रकार मुनेश राम की पत्नी के इलाज में सामने आई संवेदनहीनता, सोशल मीडिया पर उठाई गई पीड़ा अब बनी शहर में बहस का विषय

रक्सौल।(Vor desk)। सरकारी अस्पतालों में बेहतर और सुलभ इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले आम नागरिकों को अक्सर बदहाल व्यवस्था और संवेदनहीनता का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक झकझोर देने वाला मामला रक्सौल अनुमंडलीय अस्पताल से सामने आया है, जहां वरिष्ठ पत्रकार,शिक्षक सह अंबेडकर ज्ञान मंच के संस्थापक मुनेश राम की पत्नी रीता देवी (50 वर्ष) के इलाज के दौरान हुई घोर लापरवाही ने पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था और डॉक्टरों की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर व्यक्त की गई पत्रकार की यह व्यथा अब पूरे शहर में चर्चा का केंद्र और ज्वलंत बहस का विषय बन गई है।

इमर्जेंसी में गपशप और ओपीडी में बिना जांच की खानापूर्ति घटना के अनुसार, सुबह करीब 7:45 बजे वरिष्ठ पत्रकार मुनेश राम अपनी पत्नी रीता देवी को लेकर अस्पताल पहुंचे। मरीज को लगातार डिहाइड्रेशन, दस्त (लूज मोशन और डिसेंट्री), अत्यधिक कमजोरी तथा शरीर में झनझनाहट की गंभीर शिकायत थी। स्थिति को गंभीर देख जब वे तुरंत इमर्जेंसी वार्ड में एईएस रूम पहुंचे, तो आरोप है कि वहां तैनात जीएनएम अभय कुमार एसी कमरे में कुछ पुलिसकर्मियों के साथ गपशप में व्यस्त थे। अनुनय-विनय के बावजूद डॉक्टर ने मरीज को देखने से इनकार कर दिया और ओपीडी जाकर पर्ची कटाकर इंतजार करने की बात कहकर टाल दिया।बाद में पहुंचे डॉ. सुशील कुमार ने जांच की,उपचार शुरू हो।सका।

करीब 15 मिनट तक लाइन में लगकर पर्ची (Visit ID: 86277784) कटवाने के बाद ओपीडी में डॉक्टर ने मरीज को देखा, लेकिन जिस तरह से जांच की गई उसने चिकित्सकीय मानकों की धज्जियां उड़ा दीं।हालाकि,ओपीडी के डॉक्टरों ने उन्हें अतिशीघ्र इमरजेंसी वार्ड में ले जाने को कहा। जानकारी के मुताबिक, मरीज दस्त और गंभीर डिहाइड्रेशन से तड़प रही थी।

मित्रों की सजगता से मिली इमर्जेंसी में जगह, चढ़ा सलाइन सौभाग्य से, उसी समय उनके मित्र एवं बसपा नेता चंद्रकिशोर पाल अस्पताल पहुंचे। उन्होंने मरीज रीता देवी की बिगड़ती हालत को देखकर मामले की गंभीरता को समझा और हस्तक्षेप करते हुए उन्हें तुरंत इमर्जेंसी वार्ड में भर्ती कराया। इमर्जेंसी में इलाज शुरू होने और सलाइन (ड्रिप) चढ़ने के करीब तीन घंटे बाद जाकर मरीज की स्थिति नियंत्रित हो सकी। इसके बाद पर्चे पर हाथ से अतिरिक्त दवाएं (मेट्रोनिडाजोल और ओफ्लॉक्सासिन) भी दर्ज की गईं।

व्यवस्था और मानसिकता पर उठे गंभीर सवाल इस पूरी घटना ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और जिम्मेदार डॉक्टरों की मानसिकता पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • यदि कोई अनपढ़ या गरीब मरीज होता, जो ओपीडी की उस पर्ची को ही अंतिम इलाज मानकर घर लौट जाता, तो क्या होता?
  • डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट की कमी से रात में स्थिति बिगड़ने या मरीज की जान जाने पर जिम्मेदारी किसकी होती?
  • जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले डॉक्टर क्या प्राथमिक जांच (बीपी, पल्स) करने के भी पाबंद नहीं हैं?
  • क्या सरकारी अस्पताल में आने वाले आम और गरीब मरीजों की जान की कीमत इतनी सस्ती है?

पत्रकार मुनेश राम कहते हैं-“सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों को जनता के टैक्स से वेतन मिलता है। वहां आने वाला मरीज किसी पर एहसान लेने नहीं आता। वह अपने अधिकार के तहत इलाज कराने आता है।

निजी क्लीनिक में डॉक्टर मरीज की जांच के लिए तमाम उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सरकारी अस्पताल की ओपीडी में यदि प्राथमिक जांच की सुविधा और उसका इस्तेमाल ही नहीं होगा तो फिर मरीजों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा कैसे मिलेगी?

मैं अस्पताल प्रबंधन को कटघरे में खड़ा नहीं कर रहा। बल्कि मेरा सवाल पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था व कुछ डॉक्टरों की सड़ी- गली मानसिकता से है।

सरकारी अस्पताल किसी डॉक्टर की निजी जागीर नहीं है।यह जनता का अस्पताल है।


और वहां आने वाला हर मरीज-चाहे गरीब हो या अमीर, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़-सम्मान, संवेदना और उचित चिकित्सा जांच का हकदार है।आज सवाल मेरी पत्नी का नहीं है।
आज सवाल उस अनजान मरीज का है, जो अगली बार सरकारी अस्पताल पहुंचेगा और शायद अपनी बात मजबूती से कह भी नहीं पाएगा।”

वस्तुत:यह मामला सिर्फ एक पत्रकार के परिवार का नहीं, बल्कि सरकारी अस्पताल की चौखट पर उम्मीद लेकर पहुंचने वाले हर उस बेबस नागरिक का है जो अपनी बात मजबूती से नहीं रख पाता। इस पूरे घटनाक्रम के बाद स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्धजनों ने मामले की निष्पक्ष जांच करने तथा दोषी चिकित्सक ,स्वास्थ्य कर्मी पर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की मांग की है, ताकि किसी मरीज को अपनी जान गंवाकर व्यवस्था की नींद न उड़ानी पड़े।

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