
सरकारी संचिकाएं दिखाने और CCTV से छेड़छाड़ के मामले में दो कर्मी निलंबित; दो दैनिक मजदूर भी जांच के घेरे में; दोनों पक्षों के आवेदन के बावजूद FIR नहीं, कार्रवाई की दिशा पर उठे सवाल
रक्सौल (पूर्वी चंपारण)। (Vor desk)
रक्सौल नगर परिषद का प्रशासनिक विवाद अब सरकारी फाइल और CCTV से आगे बढ़ कर निलंबन की कार्रवाई तक पहुंच गया है। नगर प्रबंधक के कक्ष का CCTV बंद कराए जाने और एक बाहरी व्यक्ति को सरकारी संचिकाएं दिखाए जाने के मामले में कार्यपालक पदाधिकारी डॉ. मनीष कुमार ने प्रभारी प्रधान सहायक चंदेश्वर बैठा और उच्च वर्गीय सहायक मृत्युंजय मृणाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। कार्रवाई 16 सितंबर के पत्र संख्या 717 के तहत हुई है।
मामले में बाहरी व्यक्ति के रूप में राकेश कुमार कुशवाहा का नाम भी सामने आया है। निलंबन संबंधी कार्रवाई में उन्हें अनधिकृत व्यक्ति के रूप में संचिका दिखाए जाने का उल्लेख है। कुशवाहा कार्यवाहक सभापति पुष्पा देवी के पति हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—दो कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद जांच की अगली कड़ी कहां तक जाएगी? क्या राकेश कुशवाहा की भूमिका की भी पुलिस जांच होगी या मामला यहीं थम जाएगा?
*CCTV बंद, फाइल सामने—किसके निर्देश पर?
5 सितंबर को नगर परिषद के कंट्रोल एंड डिस्प्ले सिस्टम की जांच में CCTV कैमरों से छेड़छाड़ का मामला सामने आया। आरोप है कि चंदेश्वर बैठा ने उच्च वर्गीय सहायक मृत्युंजय मृणाल के माध्यम से संचिकाएं मंगाईं और बिना EO की अनुमति के राकेश कुमार कुशवाहा के सामने प्रस्तुत कराईं।
CCTV बंद कराने में दैनिक मजदूर जितेंद्र कुमार, पदचर और ओम बैठा, विद्युत मिस्त्री की भूमिका भी सामने आई है। दोनों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है।
लेकिन जांच का अहम बिंदु अब यही है—कैमरा बंद कराने का निर्देश किसने दिया और संचिका किस आदेश पर मंगाई गई?
*निलंबन के बाद पलटा मामला,आवेदन से बढ़ी उलझन?
नगर परिषद की ओर से कर संग्राहक पंकज कुमार सिंह ने हरैया थाना में प्राथमिकी के लिए आवेदन दिया था। पुलिस नगर परिषद कार्यालय पहुंचकर संबंधित अधिकारियों और कर्मियों से पूछताछ भी कर चुकी है।
इधर निलंबित चंदेश्वर बैठा ने भी पुलिस को आवेदन देकर EO डॉ. मनीष कुमार और कर संग्राहक पंकज कुमार सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि प्रोन्नति के नाम पर 20 लाख रुपये की मांग की गई, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल हुआ तथा बैंक चेक संख्या 933623 से 3 लाख रुपये की अवैध निकासी की गई।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित पक्षों का पक्ष और पुलिस जांच का निष्कर्ष सामने आना बाकी है।लेकिन,इस बीच निलंबन की करवाई ने मामले को पलट दिया है।सवाल है कि श्री बैठा कोर्ट की शरण लेंगे?या उन पर विभागीय कार्रवाई बढ़ेगी?उनके आक्रमक शैली को देखने के बाद स्पष्ट है कि वे हार मानते नहीं दिख रहें।शायद पंकज कुमार सिंह पुलिस को आवेदन नहीं देते,तो मामला थम जाता।बात तब बढ़ गई,जब चंदेश्वर बैठा ने भी सबूत के साथ आवेदन बढ़ा दिए।यह बात किसी को पची नहीं,क्योंकि,इससे बात बढ़ती चली गई।
*FIR पर सन्नाटा, सवाल तेज
एक तरफ नगर परिषद की शिकायत, दूसरी चंदेश्वर बैठा का आवेदन—लेकिन अब तक प्राथमिकी की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
पुलिस प्रारंभिक जांच कर रही है या FIR से पहले शिकायतों की कानूनी जांच चल रही है, इस पर आधिकारिक स्थिति सामने नहीं आई है। हरैया थानाध्यक्ष किशन कुमार पासवान का कहना है कि जांच की जा रही है।
लेकिन,यह देरी अब सवालों के घेरे में है। क्या दोनों पक्षों के आरोपों की समान रूप से जांच होगी? और यदि किसी शिकायत में प्रथमदृष्टया अपराध बनता है तो कार्रवाई कब होगी?विभाग का मामला पुलिस तक पहुंचा,तो पुलिस की चुप्पी किसके इशारे पर बनी हुई है?
*ईओ बनाम कार्यवाहक सभापति की खींचतान के बीच कर्मचारी
इस विवाद का दूसरा सिरा नगर परिषद के प्रशासनिक नेतृत्व तक जाता है। निलंबित चंदेश्वर बैठा ने दावा किया है कि उन्होंने कार्यवाहक सभापति पुष्पा देवी के मौखिक निर्देश पर काम किया।हालाकि,इससे पुष्पा देवी इनकार भी नहीं हैं।
दूसरी ओर, EO की कार्रवाई में कार्यवाहक सभापति की भूमिका और घटना की जानकारी होने के बावजूद कार्यालय को सूचना नहीं दिए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
यह दावा और आरोप अभी जांच का विषय हैं। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर पैदा होता है—
यदि कर्मचारी किसी के निर्देश पर काम कर रहे थे, तो उस निर्देश की जिम्मेदारी किसकी होगी?
और यदि उन्होंने अपने स्तर पर नियम तोड़े, तो सरकारी संचिका बाहरी व्यक्ति तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया कैसे बनी?यह जांच का विषय है कि फाइल किसके किसके पास रहती थी।क्या दफ्तर से फाइल झोले में कहीं जाती थी,तो वह ले जाने वाला कौन था?दबे जुबान से हो रही इस तरह की चर्चा और ईओ की ‘ एकतरफा सख्ती’ पर लगातार सवाल खड़े हो रहे है ।हालांकि,ईओ का कहना है कि अनुशासन का उल्लंघन करने वाले पर करवाई होगी।कानून तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।
*राकेश कुशवाहा पर जांच की आंच पहुंचेगी?
राकेश कुमार कुशवाहा का नाम सरकारी संचिका दिखाए जाने के संदर्भ में सामने आया है। लेकिन केवल किसी दस्तावेज में नाम आने से आपराधिक दोष सिद्ध नहीं होता।
पुलिस के सामने अब यह तय करना है कि उनकी भूमिका क्या थी—क्या वे केवल कार्यालय में मौजूद थे, क्या उन्हें किसी कर्मचारी ने संचिका दिखाई या इस पूरी प्रक्रिया में उनकी कोई निर्देशात्मक भूमिका भी थी।हालांकि,राकेश कुशवाहा कार्यवाहक सभापति के पति के साथ प्रतिनिधि भी हैं,जैसा कि उनका दावा है।
FIR का सवाल इसी जांच से जुड़ा है।
और वह फाइल कौन-सी थी?
पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल संचिका को लेकर है।
आखिर वह कौन-सी फाइल थी, जिसे लेकर CCTV बंद कराने तक की नौबत आई?
वह किस शाखा और विषय से संबंधित थी? उसे किसने मंगाया? किसे दिखाया गया? और उसे देखने की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या इन सवालों का जवाब सामने आए बिना मामला केवल दो कर्मचारियों के निलंबन तक सीमित रह जाएगा?इस सवाल के जवाब के लिए इंजतार करना होगा।
*अंदरखाने पैचिंग की चर्चा
इधर नगर परिषद के भीतर विवाद को शांत करने और दोनों पक्षों के बीच ‘पैचिंग’ की चर्चा भी है। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि के हस्तक्षेप की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं।
लेकिन यदि सरकारी अभिलेख और CCTV से जुड़ी अनियमितता की जांच चल रही है तो उसका निष्कर्ष दस्तावेज और साक्ष्य से ही निकलना चाहिए।जानकारों का कहना है कि सीसीटीवी की जांच हुई,तो कई राज खुल जाएंगे।ईओ के ‘एक्शन ‘ के पीछे कोई राज है,या फाइल का वह कनेक्शन है,जिसका रास्ता कठघरे तक जाता है? यदि कई विभागीय कार्य की जांच हुई,तो कई लोगों पर आंच आ सकती है।सूत्रों का दावा है कि इस विवाद के मुख्य केंद्र में कर संग्राहक पंकज कुमार सिंह है,जिस एक नप कर्मी के नाम पर अधिकतर विभागीय कार्य लगातार होते चले आ रहा है।
*अब असली परीक्षा जांच की
दो कर्मी निलंबित हो चुके हैं। दो दैनिक मजदूर जांच के घेरे में हैं। दोनों पक्ष पुलिस के पास पहुंच चुके हैं।
अब सवाल केवल यह नहीं कि किस पर कार्रवाई हुई, बल्कि यह है कि जिम्मेदारी की पूरी कड़ी कहां तक जाती है।
क्या दो कर्मियों पर गाज गिरने के बाद मामला शांत होगा? क्या ईओ और कार्यवाहक सभापति के बीच चल रहा विवाद किसी ‘पैचिंग’ से थम जाएगा? या जांच यह भी बताएगी कि फाइल किसने मंगाई, किसने दिखाई और CCTV बंद कराने का निर्देश किसका था?
रक्सौल नगर परिषद में अब निगाह इसी पर है—फाइल कांड की जांच नीचे ही रुकती है या जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला तक पहुंचती है।
