Wednesday, September 2

तीर्थ पर निकली बूढ़ी मां… नेपाल त्रासदी में बची जिंदगी, मगर छूट गया अपनों का साथ!


रसुवा और भोटे कोसी–त्रिशूली की जल त्रासदी में तीन दिन भटकी राजस्थान की महिला; भूगोल से अनजान, सदमे में जुबां खामोश—रक्सौल ने थामा हाथ, आधार कार्ड और भारतीय सिम वाला मोबाइल बना घर से जुड़ने का सहारा


रक्सौल। (Vor Desk)
वह तीर्थ और पर्यटन के लिए नेपाल गई थी। मन में अपनों के साथ लौटने की खुशी थी। लेकिन नेपाल की रसुवा त्रासदी और भोटे कोसी–त्रिशूली की जल तबाही ने उसकी जिंदगी का पूरा मंजर बदल दिया। जान बच गई, मगर अपनों का साथ छूट गया। तीन दिन तक अनजान भूगोल में भटकती रही। भूख-प्यास, डर और सदमे ने उसे इतना तोड़ दिया कि पूछने पर भी वह ठीक से कुछ बता नहीं पा रही थी।
राजस्थान से नेपाल घूमने आए 10 लोगों के दल में शामिल यह बुजुर्ग महिला सीता देवी (66वर्ष)आपदा के बाद अपने परिजनों से संपर्क नहीं कर सकी। मोबाइल पर अपनों की आवाज सुनने की बेचैनी थी, लेकिन हालात ने जैसे हर रास्ता बंद कर दिया था। वह नेपाल के भूगोल से अनजान थी। न रास्ते की जानकारी थी, न यह समझ पा रही थी कि किस दिशा में जाए। आंखों के सामने त्रासदी का वह मंजर और दिल में अपनों से बिछोह का दर्द था।
तीन दिनों तक वह अपने लोगों तक पहुंचने की राह खोजती रही।
नेपाल पुलिस किसी तरह उसे मैत्री पुल तक लेकर पहुंची, जहां उसे एसएसबी के सुपुर्द किया गया। सीमा पार पहुंचने के बाद भी उसकी आंखों में डर और अपनों को देखने की बेचैनी साफ थी। वह भूखी-प्यासी थी और सदमे के कारण ज्यादा कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं थी।
उस वक्त उसके पास मौजूद आधार कार्ड और भारतीय सिम वाला मोबाइल ही उसकी पहचान और घर से जुड़ाव का सबसे बड़ा सहारा बना। इन्हीं के जरिए उसके बारे में जानकारी जुटाने और घर लौटने की राह आसान करने का प्रयास किया गया।घर वालों से संपर्क हो सका।आधार कार्ड से पता चला कि वह उदयपुर के शास्त्री सिंक्ले निवासी रूप लाल की पत्नी हैं।
मामले की जानकारी मिलने पर स्वच्छ रक्सौल के अध्यक्ष रणजीत सिंह और महिला सहयोगी साबरा खातून ने महिला से बातचीत कर उसकी मदद की। उसकी हालत देखते हुए रणजीत सिंह ने ट्रेन का टिकट, पानी और बिस्किट उपलब्ध कराया।
अब यह बुजुर्ग मां दिल्ली होते हुए उदयपुर, राजस्थान जाएगी। कुछ दिन पहले जिन कदमों ने नेपाल की धरती पर अपनों की तलाश की थी, वही कदम अब घर की ओर बढ़ चले हैं।
पीछे छूट गया है त्रासदी का वह भयावह मंजर, लेकिन आंखों में अभी भी वही सवाल है—अपने कहां हैं?
जल त्रासदी ने उसे मौत के मुंह से तो निकाल दिया, लेकिन बिछोह का दर्द दे दिया। ऐसे वक्त में रक्सौल में मिले कुछ हाथों ने उसे फिर भरोसा दिया कि मुसीबत में इंसानियत अभी जिंदा है।
रणजीत सिंह ने कहा कि संकट की घड़ी में जरूरतमंद का साथ देना ही सच्ची मानवता है। स्वच्छ रक्सौल आगे भी प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से जरूरतमंदों की सहायता करता रहेगा।
अब मंजिल सिर्फ घर है… और हर कदम अपनों तक पहुंचने की उम्मीद।

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