
रक्सौल (पूर्वी चंपारण)।(Vor desk)। पूर्वी चंपारण जिले के रक्सौल शहरवासियों का 21 साल लंबा इंतजार आखिरकार खत्म होने जा रहा है। शहर की दो प्रमुख रेलवे गुमटियों पर बहुप्रतीक्षित ओवरब्रिज (ROB) निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। टेंडर प्रक्रिया संपन्न होने के बाद रेलवे निर्माण विभाग ने धरातल पर काम शुरू करने की तैयारियां तेज कर दी हैं। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो आगामी दशहरा पर्व के बाद रेलवे गुमटी संख्या 33-ए (बाटा चौक से नेपाल साइड) पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा। इसके बाद प्रगति को देखते हुए रेलवे फाटक संख्या 34 (परेउआ ढाला) पर भी दूसरे ओवरब्रिज का काम आरंभ होगा।
156 करोड़ की लागत से मेहरोत्रा बिल्डकॉन करेगी निर्माण इन दोनों ओवरब्रिज का निर्माण कुल 156 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कराया जाएगा। इस महत्वपूर्ण परियोजना की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश के सतना जिले की कंपनी मेसर्स मेहरोत्रा बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड को सौंपी गई है। निर्माण कार्य को गति देने के लिए आवश्यक सामग्री और भारी मशीनों को रखने हेतु इंडियन ऑयल डिपो की खाली जमीन पर विशाल स्टोरेज यार्ड तैयार किया जा रहा है, जहां जमीन की साफ-सफाई शुरू हो चुकी है। अधिकारियों के मुताबिक, एक हफ्ते के भीतर सभी उपकरण और सामग्री यहां पहुंचनी शुरू हो जाएगी तथा कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था भी यहीं की जाएगी।
वरिष्ठ अधिकारियों ने किया निरीक्षण, ट्रैफिक डायवर्जन पर मंथन शुक्रवार को पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर के निर्माण विभाग के उप मुख्य अभियंता कुमार सानू राज के नेतृत्व में इंजीनियरों की एक टीम ने रक्सौल पहुंचकर प्रस्तावित स्थलों का भौतिक निरीक्षण किया। हालांकि, टेंडर फाइनल होने के बाद भी अभी ओवरब्रिज का अंतिम नक्शा मंजूर होना बाकी है, जिससे इसकी सटीक लंबाई स्पष्ट नहीं हो सकी है। चर्चा है कि यह ओवरब्रिज मस्जिद से इंडियन कस्टम तक बनेगा। अधिकारियों के सामने मुख्य चुनौती सड़क की कम चौड़ाई है; दरअसल सड़क की कुल चौड़ाई 18मीटर है, जबकि ओवरब्रिज खुद 12 मीटर का हिस्सा कवर कर लेगा। इस तकनीकी चुनौती और भीषण जाम से निपटने के लिए रेलवे की टीम जल्द ही जिला प्रशासन के साथ बैठक कर यातायात डायवर्जन का पुख्ता प्लान तैयार करेगी।
वर्ष 2004 से अटका था प्रोजेक्ट रक्सौल के लोग वर्ष 2004 से ही ओवरब्रिज की मांग कर रहे हैं। तत्कालीन रेल मंत्री द्वारा इसका शिलान्यास किए जाने के बावजूद, फंड की कमी और एनओसी (NOC) जैसी तकनीकी अड़चनों के कारण यह परियोजना करीब दो दशकों तक सरकारी फाइलों में फंसी रही। अब धरातल पर शुरू हो रही तैयारियों से स्थानीय निवासियों, नेपाल आने-जाने वाले यात्रियों, स्कूली बच्चों और मरीजों को रेलवे फाटकों पर लगने वाले भीषण जाम से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है।(रिपोर्ट:पीके गुप्ता)
