Wednesday, May 13

एनडीए के ‘पावर हाउस’ को कैबिनेट में जगह नहीं, पूर्वी चंपारण जिले में मायूसी

हैरानी | 12 में से 11 सीटें जीतने वाले पूर्वी चंपारण का प्रतिनिधित्व शून्य, सियासी गलियारों में बहस तेज

मोतिहारी/पटना।(Vor desk)। बिहार कैबिनेट के बहुप्रतीक्षित विस्तार ने पूर्वी चंपारण के सियासी समीकरणों को चौंका दिया है। एनडीए का सबसे अभेद्य किला माने जाने वाले इस जिले को नई सरकार में कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। गुरुवार को गांधी मैदान में जब शपथ ग्रहण समारोह शुरू हुआ, तो पूर्वी चंपारण के लोग टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए बैठे थे, लेकिन अंततः उनके हाथ सिर्फ मायूसी लगी।

आंकड़ों का गणित और हकीकत

राजनीतिक जानकारों के लिए यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि पूर्वी चंपारण ने एनडीए को एकतरफा जनमत दिया था। जिले की 12 विधानसभा सीटों में से 11 पर एनडीए का कब्जा है। भाजपा के 7, जदयू के 2 और लोजपा (रामविलास) के 2 विधायक सदन में जिले का नेतृत्व कर रहे हैं। एकमात्र ढाका सीट पर राजद की जीत हुई थी, वह भी मात्र 178 वोटों के मामूली अंतर से। इसके बावजूद, मंत्रिमंडल में जगह न मिलना ‘पुरस्कार’ के बजाय ‘उपेक्षा’ जैसा प्रतीत हो रहा है।

अनुभव की लंबी फेहरिस्त दरकिनार जिले में मंत्रियों की एक लंबी फेहरिस्त रही है जिन्होंने पूर्व की सरकारों में गन्ना, विधि, सहकारिता और पर्यटन जैसे अहम विभाग संभाले हैं। मोतिहारी विधायक प्रमोद कुमार, मधुबन विधायक राणा रणधीर,केसरिया से शालिनी मिश्रा और हरसिद्धि विधायक कृष्णनंदन पासवान जैसे दिग्गजों का पिछला कार्यकाल विवाद रहित और सफल माना गया था। चर्चा थी कि जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए कम से कम दो मंत्री इस बार चंपारण से होंगे, पर अंतिम सूची में जिले का नाम गायब रहा।

सियासी समीकरण: एक नजर में

  • कुल सीटें: 12
  • एनडीए की जीत: 11 (भाजपा-07, जदयू-02, लोजपा (आर)-02)
  • विपक्ष: 01 (राजद)
  • बड़ा चेहरा: प्रमोद कुमार (पूर्व मंत्री, 4 बार के विधायक)
  • चर्चा का विषय: सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन में चंपारण की अनदेखी।

दूरगामी प्रभावों के संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिले को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व न मिलना केवल एक पद की बात नहीं है, बल्कि यह विकास योजनाओं और क्षेत्रीय पकड़ पर भी असर डाल सकता है। लोग अब इसे ‘भ्रम टूटने’ वाली स्थिति बता रहे हैं। क्या यह केवल एक सामयिक चूक है या भविष्य की राजनीति के लिए कोई नया संकेत, यह तो समय बताएगा, लेकिन फिलहाल चंपारण की जनता और कार्यकर्ताओं में नाराजगी साफ देखी जा रही है।



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