Thursday, April 23

तपती दुपहरी, मासूम के आंसू और खाकी का सुकून: रक्सौल में मानवता ने जीती गर्मी से जंग

​रक्सौल ।(Vor desk)।सीमावर्ती रक्सौल की झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और आसमान से बरसती आग के बीच मंगलवार को एक मां की ममता उस वक्त बीच सड़क पर नीलाम होने से बच गई, जब उसका चार साल का मासूम ‘कान्हा’ भीड़ में कहीं खो गया। पश्चिम चंपारण के भैरोगंज से एक शादी समारोह में शामिल होने आए इस परिवार के लिए खुशी का माहौल पल भर में मातम जैसी विवशता में बदल गया। पारा 40 डिग्री के पार था, सड़कें तप रही थीं और लू के थपेड़े बड़ों को बेहाल कर रहे थे, ऐसे में एक चार साल के बच्चे का नंगे पैर या बिना किसी सहारे के ब्लॉक रोड की सड़क में भटकना किसी अनहोनी की आहट जैसा था।

​उस भीषण गर्मी में जब प्यास और डर से मासूम का गला सूख रहा था और वह बेतहाशा रोते हुए अपनी मां को ढूंढ रहा था, तब रक्सौल रेल पुलिस उसके लिए देवदूत बनकर सामने आई। स्थानीय लोगों की सजगता और रेल थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर पवन कुमार की तत्परता ने उस जलती दुपहरी में संवेदनशीलता की ठंडी फुहार जैसा काम किया। पुलिस ने बच्चे को न केवल सूरज की तपिश से बचाया, बल्कि उसे थाने में वह सुरक्षा और दुलार दिया जिसकी उस वक्त उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी। चुनौती यह थी कि बच्चा गर्मी और घबराहट के कारण सुध-बुध खो बैठा था और अपना पता बताने में पूरी तरह असमर्थ था, जिससे परिजनों की तलाश करना पुलिस के लिए आग की दरिया पार करने जैसा कठिन हो गया था।

​लेकिन बेहतरीन पुलिसिंग का परिचय देते हुए रेल पुलिस ने तकनीक और नेटवर्क का ऐसा जाल बुना कि मोतिहारी से बगहा तक के वायरलैस सेट गूंज उठे। अंततः जब शाम की ढलती धूप के साथ मां रूबी देवी सपरिवार बदहवास हालत में थाने पहुंचीं, तो वहां का दृश्य पत्थर दिल इंसान को भी रुला देने वाला था। भीषण गर्मी की थकान और बेटे को खोने के गम से बेहाल मां ने जैसे ही अपने कान्हा को सीने से लगाया, उसके आंसुओं ने तपती धरती की सारी तपन को धो दिया। खाकी की इस मुस्तैदी ने साबित कर दिया कि जब कर्तव्य में संवेदना मिल जाए, तो वह भीषण गर्मी और विपरीत परिस्थितियों को मात देकर एक परिवार की उजड़ती दुनिया को फिर से आबाद कर सकती है। आज रक्सौल रेल पुलिस की यह मानवीय कार्यशैली समाज के लिए सुकून की वह ठंडी छांव बन गई है, जिसकी हर नागरिक उम्मीद करता है।

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