Thursday, April 23

भारत से ₹100 से अधिक के सामान पर भन्सार शुल्क के खिलाफ वीरगंज बॉर्डर पर जनअधिकार पार्टी का जोरदार धरना प्रदर्शन

रोटी-बेटी के रिश्तों पर प्रहार और मधेशियों के उत्पीड़न का लगाया आरोप; डीआईजी मधेश प्रदेश ने पुलिस को दी संयम बरतने की हिदायत

रक्सौल/वीरगंज।(Vor desk), 19अप्रैल।नेपाल सरकार द्वारा भारत से आने वाले 100 रुपये से अधिक मूल्य के निजी सामान पर अनिवार्य भन्सार शुल्क (सीमा शुल्क) लगाने और उसकी कड़ाई से वसूली के फैसले के खिलाफ सीमावर्ती क्षेत्रों में आक्रोश चरम पर है। इसी क्रम में, रविवार को जनअधिकार पार्टी ने वीरगंज स्थित नेपाल के प्रवेश द्वार ‘शंकराचार्य गेट’ पर कड़ा विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी अध्यक्ष डॉ. शरदसिंह यादव के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम कर धरना दिया, जिससे सीमा पर आवागमन बाधित हुआ।

​धरना स्थल पर मौजूद जनसमूह को संबोधित करते हुए डॉ. शरदसिंह यादव ने सरकार की इस नीति पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि महज राजस्व वसूली के नाम पर नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने प्रगाढ़ ‘रोटी-बेटी’ के सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को जानबूझकर बिगाड़ने की साजिश रची जा रही है। डॉ. यादव ने इस नियम को “हास्यास्पद” और “अवहारिक” करार देते हुए आरोप लगाया कि यह विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्र के मधेशी नागरिकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए लाया गया है। उन्होंने सरकार से जनविरोधी प्रावधान को तत्काल वापस लेने की मांग की।

​प्रधानमंत्री बालेन शाह के कार्यकाल पर टिप्पणी करते हुए जनअधिकार पार्टी के अध्यक्ष ने अपनी निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मधेशी मूल का प्रधानमंत्री बनने पर क्षेत्र की जनता में जो भारी उत्साह था, वह सरकार गठन के मात्र 22 दिनों के भीतर धूमिल हो गया है। मधेशियों के खिलाफ ऐसा ‘अप्रिय’ और कड़ा नियम लागू करना बेहद दुखद है। डॉ. यादव ने आरोप लगाया कि सरकार का ध्यान महंगाई नियंत्रित करने के बजाय केवल कर वसूलने पर है, जो मधेश के खिलाफ एक तरह की ‘अघोषित नाकाबंदी’ जैसा कृत्य है।

सीमा पर चौतरफा विरोध और राजनीतिक दबाव

​गौरतलब है कि सरकार ने राजस्व चोरी रोकने और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भन्सार महसुल अधिनियम 2081 के तहत पिछले वर्ष से कागजों में मौजूद इस नियम को अब सख्ती से लागू किया है। हालांकि, जमीनी स्तर पर इसका व्यापक विरोध हो रहा है। नेपाली कांग्रेस ने भी इस पर अपनी आपत्ति जताई है। जनता समाजवादी पार्टी के संरक्षक महन्थ ठाकुर ने एक विज्ञप्ति जारी कर इस नीति को नेपाल-भारत के बीच ऐतिहासिक आर्थिक और सामाजिक संबंधों पर प्रहार बताया है और पुरानी सहज व्यवस्था बहाल करने की मांग की है।

​वहीं, राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष विनय यादव ने इस प्रशासनिक कड़ाई को 1950 की शांति एवं मैत्री संधि के भावनाओं के खिलाफ बताया है, जिससे पर्यटक, मरीज और आम नागरिक हतोत्साहित हो रहे हैं। लायन्स क्लब ऑफ पोखरिया के अध्यक्ष नेजामुद्दीन शमानी ने भी 100 रुपये जैसे मामूली मूल्य पर टैक्स वसूली को नागरिकों के लिए मानसिक प्रताड़ना करार दिया है। विरोध का स्वर केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है; सत्ता पक्ष के राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के सांसदों ने भी प्रधानमंत्री बालेन शाह और गृह मंत्री सुधन गुरुंग से मिलकर इस अव्यवहारिक नीति पर पुनर्विचार करने का दबाव बनाया है। राजधानी काठमांडू में भी मधेशी युवाओं ने इस टैक्स नीति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जहाँ कुछ वस्तुओं पर टैक्स की प्रभावी दर 50 से 80 प्रतिशत तक पहुँच रही है।

प्रशासन की संवेदनशीलता: डीआईजी का निर्देश

​सीमा नाकों पर भन्सार में की गई सख्ती के कारण आम नागरिकों द्वारा की जा रही भारी शिकायतों और बढ़ते तनाव के बीच मधेश प्रदेश के पुलिस प्रमुख, पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) गोविंद थपलिया ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। उन्होंने मधेश से लगे नेपाल के सभी सीमा नाकों पर तैनात अधीनस्थ पुलिस निकायों को आम नागरिकों को अनावश्यक दुख न देने का सख्त निर्देश जारी किया है।कहा है कि घरेलू उपयोग के लिए लाए जाने वाले सामान्य सामानों पर पुलिस या अन्य संबंधित पक्षों द्वारा दी जाने वाली बेवजह की हैरानी को तुरंत बंद किया जाए,ताकि आम जनता के दैनिक जीवन पर बुरा असर न पड़े।

​बावजूद इसके, आंदोलनकारियों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस अव्यवहारिक नियम को वापस नहीं लिया तो जन-आंदोलन होगा।

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