
वीरगंज।(Vor desk)। नेपाल की राजनीति में मधेश का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। मधेशी जनाधिकार फोरम (मधेश) के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. भाग्य नाथ गुप्ता ने पार्टी की समीक्षा बैठक के बाद वर्तमान मधेशी नेतृत्व, नेपाली सरकार और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार मधेश की राजनीति वर्तमान में एक ऐसी ढलान पर है जहाँ सरकार से हक-अधिकार की उम्मीदें ‘कौवे के लिए बेल के पकने’ जैसी निरर्थक साबित हो रही हैं। प्रो. गुप्ता का मानना है कि काठमांडू की सत्ताधारी पार्टियाँ मधेश की बुनियादी समस्याओं के प्रति पूरी तरह उदासीन हैं, जिससे आम जनता का मोहभंग अब गहरे आक्रोश में बदल चुका है। मधेशी समाज को लगातार हाशिए पर रखे जाने से उत्पन्न यह स्थिति भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं है।
नेपाल की बदलती विदेश नीति और भू-राजनीतिक घेराबंदी पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रो. गुप्ता ने इसे मधेश की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बताया। उन्होंने तर्क दिया कि नेपाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के भीतर अमेरिकी प्रभाव की पैठ इतनी गहरी हो गई है कि वे भारत के साथ ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूती से बनाए रखने में अक्षम साबित हो रही हैं। विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के उदय को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि मधेश में भारतीय प्रभाव के समानांतर अमेरिकी प्रभाव जैसी तीसरी शक्तियों का सक्रिय होना कूटनीतिक असंतुलन पैदा कर रहा है। प्रो. गुप्ता के अनुसार मधेश की धरती पर इस तरह का विदेशी शक्ति संतुलन किसी भी दृष्टि से शुभ लक्षण नहीं माना जा सकता।
इस पूरी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू आम मधेशी जनता के भीतर व्याप्त निराशा है। प्रो. गुप्ता ने आरोप लगाया कि तथाकथित मधेशी पार्टियों ने केवल सत्ता सुख के लिए जनता की आकांक्षाओं का सौदा किया है, जिसके कारण आम मधेशी आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि जनता अब अपनी दुर्दशा के लिए केवल स्थानीय नेताओं को ही नहीं, बल्कि भारत के ‘नजरिए’ को भी एक कारक मानने लगी है। यह धारणा भारत और मधेश के बीच सदियों पुराने ‘रोटी-बेटी’ के संबंधों में बढ़ती खाई का संकेत दे रही है।
मधेश के खोए हुए गौरव को वापस लाने के लिए प्रो. गुप्ता ने एक स्पष्ट रोडमैप प्रस्तावित किया है, जिसमें सांस्कृतिक पहचान और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने ‘हिंदू कार्ड’ को सशक्त बनाकर मधेश की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने और ‘मधेशी कार्ड’ के जरिए विशिष्ट राजनीतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कागजी घोषणाओं के बजाय अब धरातल पर ऐसी ‘मधेश-मुखी’ योजनाएं उतारने का समय आ गया है जो सीधे समाज में सद्भाव और आर्थिक समृद्धि ला सकें। निष्कर्षतः, प्रो. गुप्ता की यह चेतावनी उन राजनीतिक तत्वों के लिए खतरे की घंटी है जो लंबे समय से अधिकारों के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। अब यह समय ही तय करेगा कि मधेश विदेशी दबावों से मुक्त होकर आत्मनिर्भर बन पाता है या भू-राजनीतिक खींचतान में और अधिक बिखर जाएगा।
