Tuesday, March 10

रक्सौल का चुनावी सिंहासन:विधायक प्रमोद सिन्हा की जीत ने किया साबित.. जो जीता, वही बार-बार टिका!

रक्सौल।(Vor desk)।बिहार की रक्सौल विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जहां की जनता ने ‘जो जीता वही सिकंदर’ की कहावत को अपनी वोटिंग परंपरा बना लिया है। रक्सौल में एक बार जो उम्मीदवार अपनी जीत का झंडा गाड़ देता है, मतदाता उसे बार-बार ताज पहनाकर सिंहासन पर बिठाते हैं, जबकि हारने वाले को दोबारा मौका नहीं मिलता। यह अनोखा चलन इस सीट की राजनीतिक स्थिरता का प्रमाण है।
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत सीट के पहले विधायक राधा पांडे ने ही की थी। उन्होंने 1952 में पहली जीत दर्ज की, फिर 1957 और 1962 में लगातार विजयी होकर यह साबित कर दिया कि रक्सौल की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधि पर पूरा भरोसा रखती है। उनके बाद, सगीर अहमद ने चार टर्म जीत हासिल की ।उनका कार्यकाल 1972 से 1985 तक लगातार चार बार रहा।यहां तक जब 1977में काफी विरोधी लहर थी,तब भी जीत का रिकॉर्ड बनाया।जनता दल /राजद के राजनंदन राय ने 1990 व 1995 ,भाजपा के अजय कुमार सिंह ने2000 से 2015 तक
(2000, 2005-फरवरी, 2005-अक्टूबर, 2010, 2015)
लगातार पाँच बार जीतकर इस अटूट विश्वास को शिखर पर पहुंचा दिया।
इस लंबी ‘रिपीट’ परंपरा में केवल एक ही अपवाद आए, वह थे विंध्याचल सिंह। उन्होंने 1967 में राधा पांडे को हराकर जीत हासिल की, लेकिन उनके आकस्मिक निधन ने ही इस परंपरा को टूटने से बचाया। उनके जाने के तुरंत बाद, जनता ने एक बार फिर राधा पांडे को ही 1969 में चुनकर अपने मूल सिद्धांत को स्थापित कर दिया।
इस बार भी, रक्सौल की जनता ने अपने सिद्धांत को नहीं बदला। उन्होंने पहली बार 2020 में जीते भाजपा के सीटिंग विधायक प्रमोद कुमार सिन्हा पर अपना विश्वास और मजबूत किया, न केवल उन्हें जीत दिलाई, बल्कि लगभग 19 हज़ार मतों के विशाल अंतर से विजयी बनाकर यह सुनिश्चित कर दिया कि रक्सौल का राजनीतिक सिंहासन केवल सफल उम्मीदवार के लिए ही आरक्षित है।(रिपोर्ट:पीके गुप्ता)

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