
रक्सौल/आदापुर।(Vor desk)। सत्याग्रह की धरती चंपारण के रक्सौल अनुमंडल की जनता ने दलीय तानाशाही के खिलाफ राज्य को बड़ा संदेश दिया था।आजादी के बाद हुए दूसरे चुनाव में ही आदापुर की जनता ने बाहरी प्रत्याशी को धूल चटा निर्दलीय प्रत्याशी को विधायक बना दिया,जो आज भी चर्चे में है और प्रासंगिक है।तब आदापुर विधान सभा का अलग अस्तित्व था,अब आदापुर रक्सौल विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा है। वर्ष 1957 के चुनाव में बाहरी और भीतरी प्रत्याशी के चयन को लेकर आदापुर की जनता दो गुटों में बँट गयी थी। स्थानीय लोगों ने सभी दलीय मर्यादा को ताक पर रख एक साधारण कांग्रेस कार्यकर्ता व स्वतंत्रता सेनानी ब्रजनंदन शर्मा को चुनाव लड़ा दिया और उन्हें वर्ष 1957 का निर्दलीय विधायक बना बिहार विधानसभा में भेज दिया।कहते है यह वह दौर था जब कांग्रेस देश पर एकछत्र राज करती थी और उसका प्रत्याशी कोई भी चुनाव मैदान में खड़ा हो जाये जीत सुनिश्चित होती।इसी सोंच से अभिभूत कांग्रेस ने रक्सौल के गोनहा गाँव निवासी रामसुंदर तिवारी को पहली बार टिकट दिया और वह विधायक बन गए। वही,दूसरी बार दलीय टिकट आदापुर के कांग्रेसियो को नही देकर बेतिया (चनपटिया) के हरगुन शाही को टिकट देकर तत्कालीन आदापुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतार दिया। इसके बाद कांग्रेसी दो धड़े में बँट गए और श्यामपुर के प्रमुख व्यवसायी सेठ बंशीधर के मिल में आपात बैठक बुलाई। इसका नेतृत्व उस समय के कांग्रेसी सेठ बंशीधर खुद कर रहे थे, हालांकि इस बैठक में ब्रजनंदन शर्मा खुद मौजूद नही थे। बावजूद,तय हुआ कि अबकी बार शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देते हुए स्थानीय ब्रजनंदन शर्मा को ही मैदान में उतारा जाय। बैठक से ही कांग्रेस कार्यकर्ता धबधबवा गाँव निवासी क़ाली महरा को उन्हें ढूँढने की जिम्मेदारी दी गई। वे ढूंढते स्टेशन पर पहुँचे। उस समय ब्रजनंदन शर्मा चाय की चुसकी ले रहे थे।देखते ही बोल पड़े चाय छोड़िये और बैठक में चलिए आपके भाग्य का पिटारा खुल गया। आप को विधायक चुन लिया गया है।वे भागे- भागे बैठक में पहुंचे। वही से नारा लगा। दूर हटो ये हरगुन शाही, आदापुर हमारा है…. और इसी नारे के दम पर ब्रजनंदन शर्मा पहली बार निर्दलीय विधायक निर्वाचित हुए।तब मुख्य मंत्री श्री कृष्ण सिंह खुद शाही को जिताने के आदापुर पहुंचे थे,लेकिन,जनता ने न केवल अपने मन का किया,बल्कि,इतिहास रच कर पार्टी की निरंकुश और जन विरोधी शैली पर करारा प्रहार किया था।अस्सी के दशक में भले ही आदापुर विधानसभा क्षेत्र से बाहरी उम्मीदवार के तौर पर डॉक्टर शमीम हाशमी व हरिशंकर प्रसाद यादव विधायक बने, लेकिन रक्सौल विधानसभा क्षेत्र की जनता ने कभी बाहरी उम्मीदवारों को अपना विधायक नही चुना। जैसे ही रक्सौल विधानसभा क्षेत्र से तत्कालीन पांच बार के विधायक डॉक्टर अजय सिंह का गृह गाँव अलग हुआ, दूसरी बार उन्हें भी लोगों ने चुनाव हरा दिया और स्थानीय भाजपा प्रत्याशी प्रमोद कुमार सिन्हा को विधायक चुन लिया। वयोवृद्ध समाजवादी पृष्ठभूमि के वामपंथी नेता सरदार भगत सिंह बताते है कि तत्कालीन आदापुर के बाहरी प्रत्याशी को हराने का ऐसा असर हुआ कि रक्सौल विधानसभा क्षेत्र से आजादी के बाद से अब तक कोई बाहरी प्रत्याशी चुनाव नही जीता। अब तो मुख्यधारा के कोई भी दल बाहरी प्रत्याशी को टिकट देने की हिमाकत भी नही करता। वही, श्यामपुर के प्रमुख समाजसेवी राजेश्वर पासवान व काशी पासवान एक सुर में कहते है कि क्षेत्र के विकास के प्रति जब स्थानीय प्रत्याशियों के ऐसे हालात है तो बाहरी से क्या उम्मीद किया जा सकता है।रणजीत सिंह और संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि आज के युग में दल नहीं दल दल हैं।दल बदल का क्या पूछना।अब तो राजनीतिक दल खुद में इस्टेट की तरह हो चले हैं ।दलों की गुलामी जब तक बंद नहीं होगी,तब तक यही सब चलता रहेगा।जन तंत्र में जन जन को अपनी भूमिका समझनी होगी,जिम्मेवारी निभानी होगी।बहरहाल, आसन्न विधानसभा चुनाव को लेकर यहां मुख्य धारा के दलों के बीच होड़ है। अब देखना है राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है,किसके सर पर सेहरा चढ़ता है।
