
रक्सौल, पूर्वी चंपारण।(Vor desk)।
भारत-नेपाल सीमा पर बसा सीमाई नगर रक्सौल, जो कभी अच्छे और समृद्ध व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता था, आज समस्याओं के पहाड़ तले दबा हुआ है।
बिहार विधानसभा चुनाव 11 नवंबर को होने वाला है, लेकिन रक्सौल की जनता अब भी पूछ रही है — “विकास कहाँ है?”
विकास अधूरा, सुविधाएँ नदारद
रक्सौल में ना स्टेडियम है, ना पार्क, ना बच्चों के खेलने की कोई व्यवस्था।
युवाओं के लिए खेलकूद या व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र तक नहीं हैं।
अंबेडकर चौक का गोलंबर, ओवरब्रिज और पुल निर्माण अधर में लटका है।
सड़कें जर्जर, और रिंग रोड का सपना आज भी अधूरा है।
जाम में फंसी जिंदगी
रेलवे फाटक (ढाला) के लंबे समय तक बंद रहने से जाम की समस्या भयावह रूप ले चुकी है।
अब तक एक दर्जन से अधिक गंभीर मरीजों की मौत एम्बुलेंस के जाम में फँसने से हो चुकी है।
प्रसूता महिलाएं भी समय पर डंकन अस्पताल नहीं पहुँच पातीं —
कई बार जाम में ही बच्चों को जन्म देने की दर्दनाक घटनाएं हो चुकी हैं।
वैकल्पिक सड़क या ओवरब्रिज निर्माण का कोई ठोस कदम अब तक नहीं उठाया गया है।
सरिसवा नदी बनी जहर की धारा
शहर के पूर्वी हिस्से से गुजरने वाली सरिसवा नदी, जो नेपाल के बीरगंज से आती है,
रासायनिक प्रदूषण के कारण काली जलधारा बन चुकी है।
इससे सांस, आंत, त्वचा और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं,
लेकिन प्रदूषण रोकने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिख रही।
बुनियादी सुविधाओं का टोटा
नेपाल से रोज़ खरीदारी करने आने वाले ग्राहकों के लिए
न शौचालय हैं, न वाहन पार्किंग की व्यवस्था।
महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को भारी दिक्कतें होती हैं।
शहर की सड़कों पर गंदगी, खुले नाले और अव्यवस्थित ट्रैफिक रक्सौल की पहचान बन चुके हैं।
सब्जी बाजार में सांढ़ का आतंक
स्थानीय सब्ज़ी बाजार में इन दिनों सांढ़ों का आतंक बढ़ गया है।
सांढ़ खुलेआम घूमते हैं, सब्ज़ी बेचने वालों के ठेले पलट देते हैं,
और कई बार लोगों को घायल भी कर चुके हैं।
नगर परिषद और प्रशासन की लापरवाही से बाजार क्षेत्र भय और अफरा-तफरी का केंद्र बन गया है।
पर्यटन और इको विकास की संभावनाएं
रक्सौल रेलवे परिसर का पुराना तालाब यदि ‘गौतम बुद्ध इको पार्क’ या ‘रेलवे स्टेडियम’ के रूप में विकसित किया जाए,
तो यह शहरवासियों के लिए मॉर्निंग और इवनिंग वॉक का केंद्र बन सकता है।
स्टेशन की दीवारों पर बुद्ध के उपदेश व जीवन प्रसंग उकेरने से
देशी-विदेशी पर्यटक भी आकर्षित होंगे।
वहीं आदापुर का ऐतिहासिक तालाब, जहाँ सर्दियों में साइबेरिया से पक्षी आते हैं,
अगर इसे पक्षी अभयारण्य के रूप में विकसित किया जाए,
तो यह क्षेत्र ईको-टूरिज्म का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
चुनावी मौसम में जनता की चुप्पी
करीब 2.88 लाख मतदाता इस बार चुप्पी साधे हुए हैं।
बीजेपी, कांग्रेस और जन सुराज पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है,
जबकि दो अन्य उम्मीदवार भी मौजूद हैं।
गाँव-चौराहे से लेकर चाय दुकानों तक एक ही चर्चा –
“रक्सौल का विधायक कौन?क्या अबकी बार विकास होगा?”
सरहदी शहर की तकदीर अब मटपेटियों में बंद होने को है,
लेकिन यह सच है कि रक्सौल के लोग अब भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहे हैं –
साफ हवा, खुली सड़क, सुरक्षित बाजार और जिंदा उम्मीद।
