
रक्सौल/आदापुर।(Vor desk)। भोजपुरी अभिनेता और बीजेपी सांसद दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ द्वारा रक्सौल में दिए गए विवादास्पद बयान “जो श्री राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं!” पर बवाल मच गया है।इस पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष ने इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और चुनाव से पहले विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने की हताश कोशिश करार दिया है।
विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने निरहुआ के इस बयान की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र और भाईचारे की भावना के विपरीत बताया।
विपक्ष के नेताओं की तीखी आलोचनाएँ:
इंडिया कांग्रेस(ए आई सी सी सी) के पार्टी ऑब्जर्वर दयानंद सिंह दुसाध ने कहा है कि “निरहुआ जी भूल रहे हैं कि राम हमें सब्र और मर्यादा सिखाते हैं, न कि देश के नागरिकों को ‘काम का’ और ‘बेकाम का’ बताने का अधिकार देते हैं।यूपी के रहने वाले श्री दुसाध ने कहा कि जो धर्म को राजनीति के लिए इस्तेमाल करे, वह असली राम भक्त नहीं हो सकता।”
वहीं,कांग्रेस नेता दीपक गुप्ता ने कहा कि “बेरोजगारी 45 साल के चरम पर है, किसान त्रस्त हैं, और ये पूर्व सांसद महोदय हमें धार्मिकता का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं?ऐसे बयान देकर नेता लोग केवल समाज में नफरत का बीज बो रहे हैं। उन्हें तुरंत अपने इस असंवैधानिक और आपत्तिजनक बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए।”
राजद के जिला प्रवक्ता रवि मस्करा ने कहा कि -जनता को राम नाम की आड़ में विकास और रोज़गार के मुद्दों से भटकाने की यह पुरानी चाल अब काम नहीं आएगी। हम तो जय सिया राम प्राचीन काल से कहते आ रहे हैं,लेकिन,चुनाव में ऐसी भाषा उचित नहीं।”
राजद के प्रखंड अध्यक्ष सौरंजन यादव ने कहा कि”मैं कहता हूं -‘जो कृष्ण का नहीं वो किसी काम का नहीं।उन्होंने कहा कि संविधान में विश्वास रखने वाला कोई भी नेता किसी नागरिक को उसकी आस्था के आधार पर ‘बेकार’ घोषित नहीं कर सकता। यह बयान केवल विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने के लिए दिया गया है, इसकी हम घोर निंदा करते हैं। “
कांग्रेस की रक्सौल महिला प्रखंड अध्यक्ष अंजनी गुप्ता ने कहा कि “भारत की पहचान ‘अनेकता में एकता’ है, और हम सभी एक दूसरे के देवी-देवताओं का आदर करते हैं। भाजपा नेता इस नाम की राजनीति से श्री सिया राम का अपमान कर रहे हैं।
विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि चुनाव आयोग को निरहुआ के इस बयान का संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि यह चुनावी माहौल को दूषित करने का प्रयास है। उन्होंने जनता से अपील की है कि वे भावनात्मक नारों के बजाय, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दों पर वोट दें।
