
रक्सौल।(Vor desk)।बिहार विधानसभा चुनाव की रणभूमि में, रक्सौल सीट इस समय गठबंधनो की एकजुटता और रूठे हुए अपनों को मनाने की सबसे बड़ी परीक्षा बन गई है। 11 नवंबर को होने वाले मतदान से पहले, एनडीए और इंडिया गठबंधन के भीतर का असंतोष निर्णायक साबित हो सकता है। यह केवल वोटों की नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख दलों के लिए अपने दल-जमात को सहेज कर रखने और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है।
एनडीए की अग्निपरीक्षा: भीतरघात का खतरा और प्रतिष्ठा दांव पर
लगातार छह कार्यकाल से काबिज भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सीट बचाने की नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक एकता को सिद्ध करने की चुनौती है। सीटिंग विधायक सह एनडीए समर्थित उम्मीदवार प्रमोद सिन्हा की राह में विपक्षी गठबंधन से ज्यादा खतरा भीतरघात का है। पश्चिम चंपारण के सांसद और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल की प्रतिष्ठा सीधे दांव पर है, क्योंकि पार्टी के कई पुराने और कद्दावर नेता—जो टिकट की होड़ में थे—जैसे डॉ. अजय सिंह ,महेश अग्रवाल, ई. जितेंद्र कुमार, ज्योति राज गुप्ता और उनके समर्थक खुले तौर पर नाराज चल रहे हैं।इसमें पांच टर्म के विधायक डा. अजय सिंह का टिकट 2020चुनाव में ही कट गया था,जिसके बाद उन्होंने बसपा से चुनाव लड़ा।लोक सभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी मदन मोहन तिवारी के समर्थन में दिखे।वहीं,महेश अग्रवाल इस बार भी टिकट के प्रबल दावेदारों में एक थे।दोनो खुल कर पूर्व मंत्री श्याम बिहारी प्रसाद के समर्थन में हैं,जो जनता दल यू छोड़ कर कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं।इस बार के दो निर्दलीय सहित कुल पांच प्रत्याशियों में दोनो मुख्य प्रतिद्वंदी प्रत्याशी भी एनडीए के घटक जद यू से ही है,जो,खतरा ही है।श्याम बिहारी वैश्य हैं और डॉ जायसवाल के स्वजातीय है।,इसलिए चुनौती बढ़ गई हैं।पहली बार भाजपा को यहां जो कमल खिलाएगा,वह रक्सौल पर राज करेगा कि जगह कमल खिलाने के लिए मशक्कत की बनी हुई है।दूसरी बार जीत दोहराने के लिए प्रमोद सिन्हा को कड़ी हर मोर्चे पर कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है।
असंतुष्टि से पलट सकती है बाजी,पार्टी की बनी हुई है नजर
पार्टी नेतृत्व को आभास है कि असंतुष्ट धड़ा चुनाव का बना-बनाया खेल बिगाड़ सकता है।यहां एक एक वोट कीमती हो गया है।इसको देखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री अजय जमवाल ने पिछले सप्ताह यहां पहुंच कर पूर्व विधायक डा अजय सिंह , भाजपा के बिहार मुख्यालय सह प्रभारी ई जितेंद्र कुमार,प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य राज कुमार गुप्ता आदि से मिल बैठ कर बात भी की थी।



इस संकट से निपटने के लिए डॉ. संजय जायसवाल की अध्यक्षता में बुधवार को एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। दावा भले ही संगठन की मजबूती और जीत सुनिश्चित करने का हो, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य गिले-शिकवे दूर करना और ‘अपनो को अपने साथ लेकर आगे बढ़ने’ की रणनीति पर काम करना था। यह प्रयास दर्शाते हैं कि भाजपा के लिए अब विकास के एजेंडे से ज्यादा महत्वपूर्ण कुनबे को जोड़ कर रखने की चिंता है।

खुली और बंद कमरे की बैठक चर्चा में
पश्चिम चंपारण के सांसद डॉ. संजय जायसवाल की अध्यक्षता और भाजपा जिलाध्यक्ष अशोक पांडे,प्रदीप सर्राफ की उपस्थिति में हुई बैठक एक आवासीय होटल में पहले खुले तौर पर हुई,बाद में कमरों में भी बैठकों का दौर चला,जो चर्चे में रहा। बैठक में क्षेत्र के प्रमुख एवं प्रभावशाली कार्यकर्ता, मंडल पदाधिकारी और बूथ स्तर के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक में नाम चीन चेहरे शिवपूजन प्रसाद,ई. जितेन्द्र कुमार, अजय पटेल, मनीष दूबे, पिंटू गिरि, मनोज शर्मा, गुड्डू सिंह, राजकिशोर राय उर्फ भगत जी, चंदेश्वर यादव, राजकुमार गुप्ता, भैरव गुप्ता, गणेश धनोढीया, ई प्रवीर रंजन सहित अन्य उपस्थित थे।बैठक के बाद किसी ने भी खुली प्रतिक्रिया से इनकार किया और कहा कि बैठक में चुनावी तैयारी, मतदाता संपर्क अभियान और प्रचार रणनीति को लेकर विस्तृत चर्चा की गई।हालाकि,बाद में इनमें कई चेहरे दूसरे प्रत्याशियों के लिए लॉबिंग में जुटे दिखे।

त्रिकोणीय संघर्ष: जन सुराज की सेंधमारी
जहां भाजपा अंदरूनी कलह से जूझ रही है, वहीं मुख्य मुकाबला इस बार त्रिकोणीय रूप ले चुका है। इंडिया (महागठबंधन) के कांग्रेस प्रत्याशी श्याम बिहारी प्रसाद, कांग्रेस की अपनी पुरानी सीट छीनने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। उनके लिए राहत की बात यह है कि इस बार उनके समक्ष कोई बागी उम्मीदवार नहीं है, लेकिन ,पूर्व विधान सभा प्रत्याशी राम बाबू यादव की चुप्पी और कांग्रेस की कमजोर सांगठनिक स्थिति एक समस्या के रूप में है।वहीं चुनावी गणित को जन सुराज के प्रत्याशी भुवन पटेल ने जटिल बना दिया है।
जनता दल यू के पूर्व प्रदेश सचिव कपिल देव प्रसाद उर्फ भुवन पटेल जन सुराज के प्रत्याशी है,जिनकी सक्रियता और पार्टी के विकास की राजनीति ने समीकरणों में ऐसी सेंधमारी की है कि दोनों गठबंधनों की नींद उड़ी हुई है। भुवन पटेल एनडीए के लव-कुश समीकरण के मजबूत आधार में सेंध लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वह महागठबंधन के मुस्लिम सहित अन्य वर्गों के वोटों को भी समेटने की कोशिश में हैं। यह व्यापक वोट विभाजन की संभावना ही रक्सौल में त्रिशंकु संघर्ष की स्थिति पैदा कर रही है।
जनता की चुप्पी: प्रत्याशियों की धड़कनें तेज
इस समूचे चुनावी परिदृश्य में सबसे बड़ा रहस्य जनता की चुप्पी है। स्थानीय मतदाता अपना पत्ता खोलने को तैयार नहीं हैं। यह चुप्पी प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा रही है, क्योंकि उन्हें अपने दल-जमात को सहेजने और प्रतिद्वंद्वी के वोटों को विभाजित करने की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। रक्सौल का चुनाव अब केवल जनादेश की नहीं, बल्कि नेतृत्व के संकट प्रबंधन की परीक्षा बन गया है, जिसका अंतिम परिणाम 14 नवंबर को मतगणना के बाद सामने आएगा।
