
रक्सौल।(Vor desk)।लोक आस्था का महापर्व छठ एक बार फिर यह साबित कर गया कि जनमानस की श्रद्धा और निष्ठा के आगे हर व्यवधान छोटा पड़ जाता है। सरिसवा के तट पर बसे सीमावर्ती नगर रक्सौल में, जहाँ भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य देने के लिए बीस छोटे-बड़े घाटों—आश्रम रोड घाट से लेकर सूर्य मंदिर घाट तक—को दुल्हन की तरह सजाया गया, वहाँ एक ओर जहाँ सामुदायिक सद्भाव और आस्था का जनसैलाब उमड़ा, वहीं दूसरी ओर एक गंभीर चुनौती ने प्रशासन और नागरिकों दोनों की चिंता बढ़ा दी।
वह चुनौती है, सरिसवा नदी के जल का प्रदूषण।
यह पर्व प्रकृति और जल की पवित्रता को समर्पित है, किंतु जब व्रतियों को अपने आराध्य को अर्घ्य देने के लिए घरों की छतों या वैकल्पिक मंदिरों का सहारा लेना पड़े, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हमने अपनी सदानीरा नदियों की अनदेखी की है। यह हृदय विदारक है कि एक ओर आस्था का इतना बड़ा पर्व है, और दूसरी ओर हमारी जीवनदायिनी नदी इतनी दूषित है कि व्रती उसमें उतरने से कतरा रहे हैं।

यह सराहनीय है कि पुलिस प्रशासन ने व्यापक व्यवस्थाएं की और घाटों की सज्जा में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। लेकिन छठ केवल घाटों की साज-सज्जा का पर्व नहीं है, यह जल की पवित्रता का भी पर्व है। हर वर्ष छठ पर हम घाटों पर भीड़ देखते हैं, अगले दिन सफाई होती है, और फिर नदी को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक हम सरिसवा को केवल छठ के घाट के रूप में नहीं, बल्कि रक्सौल की जीवनधारा के रूप में देखना और बचाना शुरू नहीं करते।
यह महापर्व हमें याद दिलाता है कि आस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। सरिसवा के प्रदूषण के लिए केवल प्रशासन नहीं, नेपाल की ओर से आने वाले औद्योगिक कचरे और स्थानीय लापरवाही भी जिम्मेदार है। अब जब सभी की आँखें उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए मंगलवार सुबह का इंतजार कर रही हैं, तो यह संकल्प भी लेना चाहिए कि अगले छठ से पहले हम अपनी नदी को इतना शुद्ध बना देंगे कि किसी भी व्रती को मजबूरी में अपनी छत पर छठ न मनाना पड़े। आस्था के इस महापर्व पर यह हमारी सबसे बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
