रक्सौल।( vor desk ) ।नेपाल की पहाड़ियों से निकलने वाली सरिसवा नदी से उठती आग व धुंवा की लपटें ने शहरवासियों को सहमा दिया।सोमवार को अचानक हुई इस घटना से लोगों में अफरातफरी रही।बाद में सूचना पर शहर के कोइरी टोला वार्ड 25 स्थित घोड़ासहन नहर सड़क चौक के पास सैनिक सड़क के लिए बने नए पुल के निचे हुई आगलगी पर फायर बिग्रेड वाहन ने काफी प्रयास से नियंत्रण पाया।बताया गया कि आग नदी में इकठे कूड़े में लगी थी।यह आग किसने लगाई थी,यह पता नही लग सका।कहा गया कि यदि समय रहते पहल नही की जाती,तो,उठती आग की लपटों से हादसा हो सकता था।
इस घटना से विधानसभा चुनाव के इस मौसम में रक्सौल के लिए दशकों से चुनावी मुद्दा बने सरिसवा नदी की प्रदूषण मुक्ति व संरक्षण के मसले को फिर से जिंदा कर दिया।लोग सवाल पूछने लगे कि आखिर इस सरिसवा नदी के अच्छे दिन कब आएंगे?
वैसे,प्राकृतिक के साथ खिलवाड़ का यह नजारा आज भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्र रक्सौल में देखने को मिला।जो बुद्धिजीवियों में चर्चा का विषय बन गया।लोग चिंतित हो उठे।
यह सभी मे कौतूहल का विषय था कि नदी में पानी की बजाय आग व धुवां कहां से आ गया?सूत्रों की माने तो नगर परिषद व स्थानीय लोग इसमे कूड़ा फेंकते हैं,जो,नदी को संकीर्ण बना रहा है।बाद में तट पर साजिश के तहत अतिक्रमण भी कर लिया जाता है।आये दिन कूड़े जलाने की घटना होती रहती है।लेकिन,इस बार मामला बड़ा था और खतरे का सांकेतिक भी।
कई लोग इस नदी में आग की भयंकर लपटों को देखकर भयभीत हुए, तो कई लोगों ने यह सोचा भी नहीं होगा कि क्या नदी में भी आग लगती है ?
दरअसल, रक्सौल के कोइरिया टोला वार्ड नंबर 25 छठिया घाट पर नेपाल से निकलने वाली सरिसवा नदी कूड़ा कचरा फेंके जाने से प्रदूषण का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। यह नदी स्वच्छ जल की जगह नेपाल से आने वाले चमड़ा फैक्ट्रियों के कचरे व केमिकल के साथ तो रक्सौल शहर से निकलने वाली अपशिष्ट पदार्थो को ढोने का काम करती है। इस नदी को लेकर रक्सौल में आंदोलन भी हुए।लेकिन,नतीजा सिफर रहा।
इस नदी के किनारे रक्सौल शहर समेत दर्जनों गांव बसे हैं,जहां के लोग दशकों से त्राहि त्राहि कर रहे हैं।लेकिन, सुनने वाला कोई नही है।नदी में कूड़ा, कचरा के अलावे मरे पशुओं को फेंक दिया जाता है।जिससे रहना दूभर है।गम्भीर बीमारियों से दर्जनों मौत हो चुकी है।क्या,ऐसे में राजनीतिज्ञ, व सामाजिक संगठन व प्रशासनिक अधिकारी चेतेंगे?यह सवाल कायम है।
कहते हैं कि मानव द्वारा प्रकृति से खिलवाड़ भले ही खूब किया जाता रहा है। लेकिन देर से ही सही प्रकृति इस खिलवाड़ का बदला समय समय पर ले लेती है।देखना है कि यह नदी आगे क्या करती है!
( रिपोर्ट:गणेश शंकर )