
रक्सौल।(Vor desk)। सीमावर्ती क्षेत्र रक्सौल समेत आसपास के इलाकों में कड़ाके की ठंड और कनकनी ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। जहाँ लोग घरों में दुबकने को मजबूर हैं, वहीं रक्सौल स्टेशन और प्रमुख चौराहों पर प्रशासन के इंतजाम नाकाफी साबित हो रहे हैं। विशेषकर यात्री, रिक्शा चालक, ठेला चलाने वाले और असहाय लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं।
स्टेशन पर बदहाली: कूड़े के सहारे रात काटने को मजबूर यात्री
रक्सौल रेलवे स्टेशन के आसपास अलाव की कोई ठोस व्यवस्था नहीं दिख रही है। भीषण ठंड से बचने के लिए यात्री स्वयं ही आसपास के कूड़े और सूखे पत्तों को चुनकर आग जला रहे हैं। हालांकि, नगर परिषद ने शहर के 15 अलग-अलग स्थानों जैसे कस्टम चौक, बाटा चौक और रेलवे स्टेशन पर अलाव जलाने का दावा किया है, लेकिन धरातल पर यात्री अब भी ठंड से जूझ रहे हैं।
रैन बसेरा निर्माण की सुस्त चाल पर सवाल
नगर विकास विभाग और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। रेल पार्क परिसर में रैन बसेरा का निर्माण इतनी सुस्त गति से चल रहा है कि लोगों का कहना है—”ठंड खत्म होने के बाद यह बनकर तैयार होगा।” नगर परिषद ने रेलवे स्टेशन के अलावा शहर के अन्य हिस्सों में कोई वैकल्पिक आश्रय स्थल (शेल्टर) भी नहीं बनाया है।जबकि,हर वर्ष आश्रय स्थल ठंड शुरू होते ही बन जाता था।हालाकि,नगर परिषद के कार्यवाहक सभापति पुष्पा देवी की माने तो रक्सौल रेल प्रशासन ने स्टेशन परिक्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य के कारण पार्क में स्थल उपलब्ध कराया है,जहां आश्रय स्थल बन रहा है और जल्द ही सुचारू कर दिया जाएगा ।अलाव की भी व्यवस्था जगह जगह की गई है।वार्ड स्तर पर भी अलाव प्रबंध किया जाएगा ।
प्रशासनिक पहल और जन असंतोष
एक ओर एसडीएम मनीष कुमार के निर्देश पर रक्सौल प्रशासन द्वारा कुछ क्षेत्रों में कंबल वितरण का कार्य किया जा रहा है, तो वहीं समाजसेवी और स्थानीय लोग इसे नाकाफी बता रहे हैं। समाजसेवी रंजीत सिंह ने नगर परिषद की तैयारियों को “हाथी के दांत” करार देते हुए आरोप लगाया कि दावे सिर्फ फोटो और विभागीय ग्रुप्स तक सीमित हैं, हकीकत में आम जनता के दुख-दर्द से प्रशासन का सरोकार नहीं दिख रहा है।
स्थानीय लोगों ने माँग की है कि तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक स्थलों पर पुख्ता अलाव जलाए जाएं और रैन बसेरा का काम युद्ध स्तर पर पूरा किया जाए ताकि गरीबों को राहत मिल सके।
