
रक्सौल, बिहार।(Vor desk)।बिहार विधानसभा आम निर्वाचन 2025 में रक्सौल सीट पर चुनावी जंग का मैदान अब लगभग सज चुका है। नामांकन पत्रों की गहन समीक्षा के बाद कुल 7में दो प्रत्याशियों के नामांकन रद्द होने से चुनावी तस्वीर में बदलाव आया है। कागजातों में कमी के कारण राष्ट्रीय दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रत्याशी डॉ. गौतम कुमार और सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रत्याशी धर्मवीर पासवान का नामांकन रद्द कर दिया गया है।इसकी पुष्टि निर्वाची पदाधिकारी सह एसडीएम मनीष कुमार ने की है।
नामांकन रद्द होने के बाद अब रक्सौल के चुनावी अखाड़े में मुख्य रूप से तीन प्रमुख चेहरे मुकाबले में हैं।इसमें भाजपा के प्रमोद सिन्हा(सीटिंग विधायक) ,कांग्रेस के श्याम बिहारी प्रसाद (पूर्व मंत्री)के बीच कांटे का टक्कर तय है।जन सुराज के कपिलदेव प्रसाद उर्फ भुवन पटेल की उपस्थिति चुनाव को रोचक बना रही है,और परिणाम में उल्ट फेर कर सकती है।
मैदान में बचे ‘योद्धा’: दो राष्ट्रीय दलों में सीधा मुकाबला, एक नई क्षेत्रीय ताकत त्रिकोण बनाने की कोशिश में
नामांकन रद्द होने के बाद अब मुख्य रूप से तीन प्रभावी उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें से दो राष्ट्रीय दलों से हैं और एक प्रदेश की नई पार्टी का मजबूत चेहरा है:

दो राष्ट्रीय दलों में सीधी टक्कर बनाम नई ताकत
रक्सौल में अब साफ तौर पर दो राष्ट्रीय दलों (भाजपा और कांग्रेस) के बीच सीधी और कांटे की टक्कर है। वहीं, प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक ताकत जन सुराज के उम्मीदवार कपिलदेव प्रसाद उर्फ भुवन पटेल के मैदान में उतरने से मुकाबला अब त्रिकोणीय हो गया है। माना जा रहा है कि जन सुराज का प्रत्याशी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे किसी भी दल के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी।
इन तीन प्रमुख उम्मीदवारों के अलावा दो निर्दलीय प्रत्याशी धुरेन्द्र कुमार और मो. कलीम के नामांकन पत्र भी वैध पाए गए हैं।इस तरह अब कुल 5प्रत्याशी मैदान में हैं।
सिर्फ 48 घंटे का इंतजार
सभी की नजरें अब 23 अक्टूबर की तारीख पर टिकी हैं, जो नाम वापसी की अंतिम तिथि है। इस तारीख के बाद ही चुनावी तस्वीर पूरी तरह से साफ होगी और प्रत्याशियों को चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिए जाएंगे, जिसके साथ ही प्रचार का शोरगुल तेज हो जाएगा।
रक्सौल की जनता 11 नवंबर को अपना बहुमूल्य वोट डालेगी
और 14 नवंबर को चुनाव परिणाम सामने आएगा। यह मुकाबला रोमांचक होने की पूरी उम्मीद है, जहां अनुभवी राष्ट्रीय नेताओं के सामने एक क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा भी अपनी जगह बनाने को बेताब है।
