Sunday, March 8

रक्सौल का सियासी संग्राम: बीजेपी के दांव पर पुराने दिग्गज रामानंद सिन्हा!

रक्सौल (पूर्वी चंपारण)।(Vor desk)। बिहार विधानसभा चुनाव के महासंग्राम में रक्सौल सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर अपने निवर्तमान विधायक प्रमोद कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित कर ‘पुराने भरोसे’ पर दांव लगाया है।पिछली बार उनकी शानदार जीत को देखते हुए उन पर पार्टी ने दुबारा भरोसा जताया है। हालाँकि, इस बार उनकी राह आसान नहीं है, क्योंकि उनके सामने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के बागी और अब जनसुराज के प्रत्याशी भुवन पटेल मैदान में हैं, जो त्रिकोणीय मुकाबले का संकेत दे रहे हैं।हालाकि,अभी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार की घोषणा भी नहीं हुई है।ऐसे में यहां त्रिकोणीय मुकाबला होने की पूरी संभावना है।
राजनीतिक सफर: जदयू से भाजपा तक का लंबा सफ़र
प्रमोद कुमार सिन्हा बिहार की गठबंधन राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी रहे हैं, जिनका राजनीतिक जीवन वर्षों पुराना है:

  • नीतीश कुमार के शुरुआती साथी: सिन्हा ने अपना राजनीतिक जीवन समता पार्टी के गठन के समय नीतीश कुमार के साथ शुरू किया था।वे मुख्यमंत्री श्री कुमार के करीबी माने जाते हैं।
  • जनता दल यू में कद्दावर नेता: बाद में, वह जनता दल यू (जदयू) के महत्वपूर्ण सदस्य बने। इस दौरान उन्होंने संगठन में ऊंचे पद संभाले, जिसमें राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और पूर्वी चंपारण के जिलाध्यक्ष का पद प्रमुख है। यह दर्शाता है कि वे न केवल एक चुनावी नेता हैं, बल्कि संगठन पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं।वे घोड़ासहन विधान सभा क्षेत्र से दो बार पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़े थे।
  • भाजपा में प्रवेश और 2020 की जीत: 2020 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, उन्होंने जदयू छोड़कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक भाजपा का दामन थामा। पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए टिकट दिया, और उन्होंने यह साबित भी किया।

    2020 का परिणाम और जीत का अंतर

    पिछला चुनाव प्रमोद सिन्हा के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ था, जब उन्होंने भारी अंतर से जीत दर्ज कर अपनी नई राजनीतिक पारी को मजबूती दी:


श्री सिन्हा ने कांग्रेस के राम बाबू प्रसाद यादव को 36,923 वोटों के विशाल अंतर से हराया था। यह जीत रक्सौल में भाजपा के दबदबे को स्थापित करती है और मौजूदा चुनाव में उनकी उम्मीदवारी का सबसे बड़ा आधार है। यह जीत केवल भाजपा के पक्ष में नहीं थी, बल्कि स्थानीय मतदाताओं द्वारा डॉ. अजय कुमार सिंह का टिकट कटने के बाद भी सिन्हा पर दिखाए गए व्यक्तिगत विश्वास को भी दर्शाती है।


2025 की चुनौती: बागी बनाम सक्रियता
इस बार प्रमोद सिन्हा को एक नहीं, बल्कि कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है: *इंडिया गठबंधन यहां आमने सामने की टक्कर की तैयारी है,हालाकि,अब तक उम्मीदवार का नाम सामने सामने नहीं आया है।पिछली बार भी इंडिया गठबंधन(महागठबंधन) ही आमने सामने थी,किन्तु,निर्दलीय सुरेश यादव ने लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने का पूरा प्रयास किया था।ऐसे में वोट बिखरने से उनकी राह आसान हो गई थी।

जनसुराज के बागी: भुवन पटेल, जो जदयू के बागी उम्मीदवार के रूप में जनसुराज के बैनर तले मैदान में हैं, सिन्हा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। पटेल की उम्मीदवारी से मुख्य रूप से जदयू के पारंपरिक वोटों में सेंध लगने की संभावना है, जो अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के वोट आधार को प्रभावित कर सकता है।जनता दल यू के पूर्व जिला अध्यक्ष, प्रदेश सचिव,और राज्य कार्यकारणी सदस्य श्री पटेल लव कुश समीकरण और एनडीए के पुराने जुड़ाव का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे।

हालांकि, भाजपा को भरोसा है कि प्रमोद सिन्हा अपनी लगातार सक्रियता और रक्सौल के विकास के प्रति समर्पण के कारण इन चुनौतियों से पार पा लेंगे। इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता और केंद्र सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं के दम पर पार्टी जीत को लेकर आश्वस्त है।
रक्सौल की यह सीट अब प्रमोद सिन्हा के लिए केवल एक चुनावी जंग नहीं, बल्कि उनके लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक कौशल और नए दल में उनकी प्रासंगिकता की भी परीक्षा है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या रक्सौल की जनता पुराने भरोसे पर फिर से मुहर लगाती है या इस महागठबंधन की तैयारी और बागी उम्मीदवार की चुनौती भारी पड़ती है।

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